मिलिए एक शिक्षक से जो अपनी सिमित आय में भी देखभाल कर रहे है कई बुजुर्गों और अनाथों की!

एक छोटी से छोटी कोशिश भी दुनियां को बेहतर बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण पहल है। और हम सब मिलकर छोटी-छोटी कोशिश कर सकते हैं। आज की कहानी है ऐसी ही एक छोटी सी कोशिश की।

गाडगे बाबा के पदचिन्हों पर चलकर देश की सेवा कर रहे है चंद्रपुर के श्री. सुभाष शिंदे !

गरीब परिवार में जन्मे, सुभाष ने एक रात सपने में देखा कि वो एक सोनार बन गया है और गहनों की दूकान का मालिक है। अपनी लगन और मेहनत से उन्होंने ये मुकाम हासिल भी किया। पर उनकी पहचान इस सोने की दूकान से नहीं बल्कि उनके सोने जैसे दिल से बनी!

भीख मांगकर पाला बेसहारो को! हज़ारो की माई – सिंधुताई सपकाळ !

आज़ादी के महज़ १५ महीनो बाद, देश, चाचा नेहरू का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मना रहा था। इसी दिन यानी १४ नवंबर १९४८ को, पिंपरी मेघे, वर्धा गाँव के एक गरीब भैंस चराने वाले अभिमान साठे के घर एक बच्ची का जन्म हुआ। किसी को नहीं पता था कि बाल दिवस के दिन पैदा हुई ये लड़की एक दिन हज़ारो बच्चों की माई बन जायेगी।

अतीत के अंधेरो को मिटाकर एक उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ रहे है बाल सदन के बच्चे !

एक बच्चा जो बकरी के बाड़े में पाया गया, एक विधवा जिसके अतीत ने उसे मौन कर दिया, एक किशोरी जिसका व्यापार उसकी माँ एवं सौतेले बाप ने कर दिया – यह अनेकों उदाहरणो मे से कुछ उदाहरण है जिनका अतीत भले अंधकारमय रहा हो, किन्तु बाल सदन ने उन्हे अपने उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न देखने की न सिर्फ हिम्मत दी, बल्कि उसे पूरा करने का संकल्प भी लिया |