ग्रीन ग्रुप से महिलाओं को सशक्त बनाकर गाँवो में उम्मीद रोपते ‘होप’ समूह के छात्र

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रों ने होप नाम की एक संस्था बनाई है, जिसमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के साथ काशी विद्यापीठ, दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र और प्रोफेसर जुडकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. ये छात्र गांवों में जाकर वहाँ की समस्याओं को अपने बेहतर आइडिया से समाधान में बदल रहे हैं.

मिलिए पत्रकार से किसान बने गिरीन्द्रनाथ झा से, जो अब अपने गाँव को नयी पहचान दे रहे है!

एक पत्रकार, एक लेखक, इन्टरनेट की दुनियां का एक जाना माना नाम आखिर क्यूँ एक किसान बन गया? ये कहानी है चनका, बिहार के लेखक किसान, गिरीन्द्रनाथ झा की।

मुंबई के 300 छात्रों ने 2 साल तक हर रविवार साथ मिलकर काम किया और इस गाँव में बना दिये 107 शौचालय।

मुंबई के किशिनचंद चेलारम महाविद्यालय के छात्रो ने सभी को प्रभावित करते हुये पलघर जिले के कारवाले गाँव में 107 शौचालय निर्मित किए हैं जिसमें गाँव में रह रहे हर परिवार के लिए एक शौचालय है।

बिना मिट्टी के खेती की इस अनोखी तकनीक से संकट से उबर सकते है किसान!

कनिका ने क्लेवर बड की स्थापना की है, जो खेती करने के ऐसे तरीके पर काम करती है, जिससे न सिर्फ फसलों की गुणवत्ता अच्छी होती है, बल्कि फसलें कहीं भी कभी भी आसानी से उगाई जा सकती हैं और वो भी बिना कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग के। इतना ही नहीं फसलें बिना मिट्टी के भी उगाई जा सकती हैं।

सतत विकास की और बढ़ते कदम: 15 ऐसे गाँव जिन्हें देखकर आपका मन करेगा अपना शहर छोड़ यहाँ बस जाने को!

कुछ गाँव ऐसे है जो सुविधाओं में किसी शहर से कम नहीं है पर उनके मूल में वही भारतीय ग्रामीण संस्कृति बसती है। यह कुछ ऐसे गाँव है जो ना सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में पूरी तरह से आत्मनिर्भर है, साथ ही मानव जाति व प्रकृति के बीच किस तरह अद्भुत सामंजस्य बनाया जा सकता है, इसकी मिसाल पेश करते हैं।

इंग्लैंड में अपनी ऐशो-आराम की ज़िन्दगी छोड़, भारत के गाँवों को बदल रहे है ये युवा दंपत्ति!

2014 में एक पति पत्नी का जोड़ा इंग्लैंड में अपनी ऐशो आराम की ज़िन्दगी छोड़कर भारत वापस आ गया। वापस आकर इन्होने न सिर्फ कई गाँवों को नशामुक्त कराया बल्कि अब एक गाँव के हर घर में शौचालय बनवाने की मुहीम में भी जुटे हुए है।

नोटबंदी से बिलकुल प्रभावित नहीं है ये छोटा सा गाँव – जानिये कैसे!

पांच सौ और हज़ार रूपये के नोटों को बंद हुए एक हफ्ता गुज़र चूका है पर लोग अभी भी अपने पुराने नोट न बदले जाने से परेशान है। काले धन पर लगाम कसने की प्रधानमंत्री की इस मुहीम का लोग जमकर साथ तो दे रहे है पर कहीं न कहीं इस कदम से पनपी असुविधाओं से अब हताश भी हो चले है। पर ऐसे में एक गाँव ऐसा है जो नोटबंदी के इन दुष्परिणामो से बिलकुल अछुता है। ये गाँव है हमारे देश का पहला डिजिटल गाँव, अकोदरा!

सूखी झील को पुनर्जीवित कर उत्तरी कर्नाटक के किसानों ने हल की सूखे की समस्या।

उत्तरी कर्नाटक के हालियाल और मुण्डोगोड जिले के किसान लगभग दो सालों से पानी की कमी से जूझ रहे थे। पीने के पानी और खेती के लिए उनके पास काफी कम मात्रा में पानी बचा था।इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने एक सूखी हुयी झील को पुनर्जीवित करने का कार्य किया।

‘काऊइस्म’ – स्वदेशी गाय हो सकती है किसानो की हर समस्या का हल !

काऊइसम (Cowism), कंप्यूटर इंजिनियर, चेतन राउत द्वारा शुरू किया गया एक स्टार्ट अप है। चेतन का मानना है कि खेती के साथ साथ स्वदेशी गाय पालन ही किसानो की आत्महत्या रोकने का एकमात्र उपाय है।

20 साल इंतज़ार के बाद खुद ही सड़क बना रहे ग्रामीणों को अब चाहिए सरकार का थोड़ा सा सहारा!

झारखंड के हजारीबाग जिले में एक गांव है, लराही। भारत के ज़्यादातर गांवों की तरह पक्की सड़क का न होना यहाँ भी एक बुनियादी समस्या है। साल-दर-साल चुनावी मौसम में नेता ग्रामीणों से गाँव में सड़क बनवाने का वादा करते रहे और ये वादे बारिश के पानी की तरह बहते रहे। जब 20 साल तक सड़क बनाने की अर्जी नहीं सुनी गई तो गाँव वालो ने इस काम का बीड़ा खुद ही उठा लिया और लगभग पूरा भी कर दिखाया।

जानिये कैसे आम सेवा केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों में ई-गवर्नेंस की क्रांति ला रहे हैं !

समूचे देश में ऐसे ग्रामीणों की संख्या बढती जा रही है जो आम सेवा केन्द्रों पर जाकर सरकारी दफ्तरों की लम्बी लाइन से बच रहे हैं। ये आम सेवा केंद्र ई-गवर्नेंस के केन्द्रों की तरह काम करते हैं।

महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े हुए गाँव को अपना जीवन समर्पित कर विकसित किया इस डॉक्टर दम्पति ने !

डॉ. रविन्द्र कोल्हे और डॉ. स्मिता कोल्हे ने मेलघाट के वासियों की ज़िन्दगी बदल दी है। उन्होंने उस इलाके की स्वास्थ्य सुविधाओं को एक नया आयाम दिया है और लोगों को बिजली, सड़क और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध कराये हैं। आईये जाने उनके इस अद्भुत सफ़र की कहानी।

क्यूँ उगा रहे है किसान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा अपने खेत में?

किसान - इस शब्द से जो सबसे पहला ख्याल हमारे मन में आता है वो है गरीबी, भुखमरी और ...आत्महत्या ! हम सब इस तस्वीर को बदलना चाहते है लेकिन उसके लिए हमे उनकी समस्या के जड़ तक पहुंचना होगा। इसी काम को करने के लिए कलाकारों का एक दल पिछले छह महीनो से मध्य प्रदेश के पारडसिंगा नामक गाँव में युवा किसानो के साथ मिलके खेती कर रहा है। पर ये खेती दाल, चावल या सब्जियों की नहीं है बल्कि एक सन्देश की है। एक सन्देश देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम।

भारत और जापान के कलाकार मिल कर सजा रहे है बिहार के इस गाँव के स्कूल की दीवारों को !

बिहार राज्य में स्थित सुजाता गाँव में हर साल निरंजना पब्लिक वेलफेयर स्कूल ‘वाल आर्ट फेस्टिवल’ का आयोजन करते है। भारत और जापान दोनों देशो के असंख्य कलाकार इस उत्सव में शामिल होने के लिये ३ हफ्ते इसी गाँव में आकर रहते है।

दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के ज़रिये हफ्ते भर में २५३ गाँवों में पहुंची बिजली !

दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत पिछले सप्ताह 8 फरवरी और 14 फरवरी के बीच देशभर में कुल 253 गाँवों में बिजली पहुचाई गयी।