इस दंपत्ति के प्रयासों से सड़को पर भीख मांगने वाले बच्चे आज विदेश में पढ़ रहे हैं!

चेन्नई के एक दंपत्ति, उमा एवं मुथूराम, द्वारा संचालित संस्था 'सुयम चेरीटेबल ट्रस्ट' एक एनजीओ है जो सड़कों और गलियों में रहने वाले गरीब परिवारों को पुनर्वासित करने में जुटी हुई हैं। इनके प्रयासों से गरीब और भीख माँगने वाले बच्चे भी विदेशों और प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। चेन्नई के एक दंपत्ति, उमा एवं मुथूराम, द्वारा संचालित संस्था 'सुयम चेरीटेबल ट्रस्ट' एक एनजीओ है जो सड़कों और गलियों में रहने वाले गरीब परिवारों को पुनर्वासित करने में जुटी हुई हैं। इनके प्रयासों से गरीब और भीख माँगने वाले बच्चे भी विदेशों और प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

देहरादून में एक स्कूल के माध्यम से 1500 खास बच्चों की जिंदगी संवार रही है ये दो सहेलियां!

देहरादून में खास जरूरत वाले बच्चों को जिंदगी जीने का तरीका सिखाते दो दोस्त - जो म्क्गोवान और मंजू की कहानी| 1996 में मंजू सिंघानिया और जो म्क्गोवान चोपड़ा ने एक ख़ास स्कूल की शुरुआत की थी जो ख़ास जरूरत वाले बच्चों के लिए था| अपनी इन कोशिशों से वो अब तक 1500 से भी ज्यादा बच्चों की जिंदगी को बेहतर बना चुके हैं| हालांकि, शुरुआत में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, पर अब जा कर उनकी मुहिम रंग लाई है| उनके इस संघर्ष और प्रयासों को जानने के लिए पढ़े उनकी ये बेहतरीन दास्तां|

इन पांच आसान तरीकों से देश में मिट सकती है निरक्षरता!

देश में साक्षरता बढ़ाने के तमाम प्रयासों के बाबजूद साक्षरता दर वैश्विक औसत की तुलना में लगातार गिर रही है। रेणु शर्मा ने इस समस्या के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करते हुए देश की साक्षरता दर में बढ़ोतरी के सुझाव दिए हैं, जिससे हम अपनी साक्षरता दर वैश्विक राज्यों की साक्षरता के स्तर पर पहुंचा सकें।

सरकारी स्कूल की ईमारत गिरा दिए जाने पर गांववालों ने मिलकर किराये के मकान में चलाये रखा स्कूल!

सिर्फ ईमारत न होने के कारण गाँव का ये एकमात्र स्कूल बंद न हो जाए इसलिए गांववालों ने मिलकर ये फैसला लिया।

छत्तीसगढ़ के इस अंग्रेजी मीडियम स्कूल की फीस है बस एक पौधा!

छ्त्तीसगढ़ के एक गांव में एक स्कूल बिना फीस के बच्चोंं को बेहतर शिक्षा दे रहा है, और बदले में फीस के तौर पर अभिभावकों को एक पौधा लगाना होता है।

शिक्षा से महरूम ज़िंदगियों में ज्ञान का दीप जलाते बंगलुरु के शेरवुड सोसाइटी के लोग!

बंगलुरु के टाटा शेरवुड रेज़िडेंशिअल सोसाइटी में घरेलू काम करने वालों के बच्चे हर रविवार दोपहर में ट्यूशन करने आते है, जो सोसाइटी में रहने वाले लोगों द्वारा संचालित की जाती है। इस सोसाइटी में रहने वाले लोग, एक स्वैछिक समूह 'SEE' के सदस्य हैं जो कि अपार्टमेंट में काम करने वाले कामगारों के बच्चों की स्कूल की सालाना फ़ीस के लिए चन्दा इक्कठा कर मदद करता है।

पिता के साथ जेल में रहकर की IIT की तैयारी और 453 रैंक हासिल किया!

जेल में रहकर इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करना और IIT JEE में 453 रैंक पाना – 18 साल के पीयूष के लिए सफर मुश्किल था, पर उसकी मेहनत और लगन के कारण नामुमकिन नहीं था।

विदेश में पढ़ रही दो भारतीय छात्राएं, मोबाइल फ़ोन के ज़रिये मुफ्त में सीखा रही है अंग्रेजी !

शिक्षा में एक छोटा सा बदलाव पीढियां बदल देता है। पर भारत में ज्यादातर अशिक्षित लोग आर्थिक कारणों से स्कूल छोड़ देते हैं और जाहिर है कि स्कूल छूटने के बाद पढ़ाई भी छूट जाती है। वही वक्त की मांग कुछ ऐसी है कि शहरों में रिक्शा चालक से लेकर छोटे-छोटे काम करने वालों तक अंग्रेजी बोलना और समझना सबके लिए जरुरी हो गया है। लेकिन इन्हें सिखाने का जिम्मा कौन उठाये? सिर्फ अंग्रेजी सीखने के लिए स्कूल वापस जाना इनके लिए संभव नहीं है और न ही कोचिंग क्लासेस की महँगी फीस देना। ऐसे में दो अंडरग्रेजुएट लडकियों की एक पहल, इनकी ज़िंदगी में रौशनी भर रहा है।

अपनी आधी तनख्वाह गरीब छात्रों की किताबो में खर्च कर देता है यह कोलकाता का यह शिक्षक !

हावड़ा के सरकारी स्कूल में टीचर ध्रुबज्योति सेन अपनी तनख्वाह के आधे पैसे से ऐसे बच्चों को पढ़ने में मदद करते है। ध्रुबज्योति गणित पढ़ाते हैं और ऐसे बच्चों के लिए आज हरदम तैयार खड़े हैं। दसवीं पास कर चुके ऐसे छात्र जो विज्ञान में रुचि रखते हैं, उन्हें ध्रुबज्योति निशुल्क पढ़ाते हैं।

34 साल की उम्र में माँ बनी दसवी में टॉपर, बेटे ने दुहराया इतिहास!

गरीबी के कारण आठवी कक्षा के बाद पढाई छोड़ चुकी ज्योती ने आखिर 34 साल की उम्र में , दो बच्चो की माँ बनने के बाद टॉपर बनकर दसवी पास की। पर उनके लिए असल गौरव का क्षण तब था जब उनके बेटे ने भी उसी स्कूल में इस साल दसवी में टॉप कर के उनका इतिहास दुहराया। आईये जाने इस टॉपर माँ- बेटे की कहानी।

ATM की रौशनी में गरीब बच्चो को पढाता है ये सुरक्षाकर्मी !

माजरा, देहरादून के रहने वाले बिजेंदर एक ATM में सुरक्षाकर्मी के रूप में काम करते है। पर जैसे ही दिन ढलता है और सडको की बत्त्तियाँ जलती है तब बिजेंद्र जो करते है वो किसी को भी प्रोत्साहित करने के लिए काफी है।

ए.सी क्लासरूम, वनस्पति उद्यान, छात्रों के लिए टेबलेट – निजी विद्यालयों से बेहतर बन रहा है यह सरकारी विद्यालय!

पुणे जिले के वाब्लेवादी गाँव में एक ऐसा सरकारी विद्यालय है, जो देश के अन्य विद्यालयों से भिन्न है। हालाँकि अब यह पुरानी बात हो गयी है, फिर भी इसकी गूँज दूसरों तक पहुंचना बाकी है।

एक अखबार जिसके पत्रकार, संपादक और विक्रेता है फुटपाथ पर रहनेवाले मासूम बच्चे !

देश में लाखो मसले है, जिनमे से एक है बालमजदूरी और उससे जुडी हुई मजबूरियां। जब फुटपाथ पर रह रहे कुछ बच्चो ने देखा कि किसी अखबार या मीडिया में उनकी समस्याओ के लिए कोई जगह नहीं है, तब उन्होंने अपनी बात आप तक पहुंचाने के लिए स्वयं ही एक अखबार चलाना शुरू कर दिया। आईये जाने इन बच्चो के इस अखबार के बारे में !

४६ बार दसवी में फेल होने के बावजूद ७७ साल के शिवचरण ने नहीं मानी हार !

जहाँ आज के युवा पहली ही बार में मार्क्स कम आने पर निराश हो जाते हैं और आत्महत्या तक करने की सोच लेते है, वही एक मिसाल ऐसी भी है जिनसे इन निराश बच्चो को प्रेरणा मिल सकती है।

सरकारी स्कूल के एक शिक्षक ने बनाया शिक्षा का अनोखा मॉडल!!!

जिला परिषद् के एक सामान्य स्कूल को एक नौजवान शिक्षक ने अपनी मेहनत से डिजिटल स्कूल में परिवर्तित किया है। इस स्कूल से प्रेरित होकर महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के ५०० स्कूलो को डिजिटल बनाने का फैसला किया है।