किसान : मैथिलीशरण गुप्त !

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है, है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है. तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते, यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते