बिना मिट्टी के खेती की इस अनोखी तकनीक से संकट से उबर सकते है किसान!

कनिका ने क्लेवर बड की स्थापना की है, जो खेती करने के ऐसे तरीके पर काम करती है, जिससे न सिर्फ फसलों की गुणवत्ता अच्छी होती है, बल्कि फसलें कहीं भी कभी भी आसानी से उगाई जा सकती हैं और वो भी बिना कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग के। इतना ही नहीं फसलें बिना मिट्टी के भी उगाई जा सकती हैं।

इन पांच आसान तरीकों से देश में मिट सकती है निरक्षरता!

देश में साक्षरता बढ़ाने के तमाम प्रयासों के बाबजूद साक्षरता दर वैश्विक औसत की तुलना में लगातार गिर रही है। रेणु शर्मा ने इस समस्या के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करते हुए देश की साक्षरता दर में बढ़ोतरी के सुझाव दिए हैं, जिससे हम अपनी साक्षरता दर वैश्विक राज्यों की साक्षरता के स्तर पर पहुंचा सकें।

मिलिए एक शिक्षक से जो अपनी सिमित आय में भी देखभाल कर रहे है कई बुजुर्गों और अनाथों की!

एक छोटी से छोटी कोशिश भी दुनियां को बेहतर बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण पहल है। और हम सब मिलकर छोटी-छोटी कोशिश कर सकते हैं। आज की कहानी है ऐसी ही एक छोटी सी कोशिश की।

इस दिवाली पर इस 13 साल की बच्ची की बनायीं कंदीले खरीदकर, बेसहारा लोगो के जीवन में लायें रौशनी!

बम्बई की एक 13 साल की क्षिर्जा राजे, अपने हस्तशिल्प व्यापार से कमायें सारे लाभ को ज़रूरतमंदों की सहायता में ख़र्च करती है। क्षिर्जा की कहानी हाल ही में “ ह्यूमन्स ऑफ़ बॉम्बे “ के फेसबुक पेज पर साझा की गयी थी।

कचरे से संगीत पैदा करते ‘धारावी रॉक्स बैंड’ के होनहार बच्चे!

कचरा बीनने वाले बच्चो का जीवन बेहद कठोर होता है। सारा दिन गंदगी में से कचरा बीनना, उन्हें अपने ही झोपड़े में लाकर चुनना और फिर जैसे तैसे अपना पेट भरना- बस यही उनका जीवन था। इन बच्चो का बचपन, उनकी गरीबी की बिमारी की वजह से दम तोड़ चुका था। विनोद सिर्फ इनके स्वास्थ्य और बाकी अधिकारों के लिए ही नहीं बल्कि इनके नीरस और कठोर जीवन में थोड़ी सी मिठास लाने के लिए भी कुछ करना चाहते थे। इसी सोच की नींव पर शुरुआत हुई, थिरकते, गुनगुनाते और गुदगुदाते संगीत से भरे बैंड, 'धारावी रॉक्स' की!

अपनी घरेलू सहायक के साथ मिलकर सैकड़ों गरीब बच्चों को पढ़ा रही है नोयडा की मीना निझवान!

हममें से शायद ही कोई होगा जो समाज को कुछ देने की ख्वाहिश न रखता हो। हम सब सामाजिक मदद करना चाहते हैं, लेकिन अक्सर अकेले होने की वजह से या कहाँ से शुरू करें इन सवालों से जूझते रहते हैं। और अपने रोजमर्रा की ज़िन्दगी में खो जाते हैं। ये कहानी आपके इन सवालों को रास्ता दिखाएगी।

भारत-पकिस्तान सीमा पर बसे तीन बच्चो की दोस्ती की कहानी!

कहते है बच्चे भगवान् का रूप होते है। और भगवान् की कभी किसीसे कोई दुश्मनी नहीं होती; उनके लिए सब एक जैसे होते है। भारत- पकिस्तान की दुश्मनी की खबरों के बीच ऐसे ही कुछ बच्चो की कही कुछ बाते हर किसी के दिलों को छु रही है।

मुंबई आकर भीख मांगने और गजरे बेचने को मजबूर किसानो के बच्चो को देश का पहला सिग्नल स्कूल दिखा रहा है जीने की नई राह !

मोहन उन हज़ारो किसानो के बच्चो में से एक है जो अपना गाँव, अपना खेत और अपना घर छोड़कर रोज़गार की तलाश में मुंबई आते है। पर यहाँ भी गरीबी और भुखमरी उनका साथ नहीं छोडती। ऐसे में शिक्षा के बारे में सोचना तक उन्हें दूर की बात लगती है। पर अब देश के पहले सिग्नल स्कूल के खुल जाने से मोहन जैसे कई बच्चो को अपने भविष्य को सुधारने का मौका मिल रहा है।

छुट्टे पैसे के बदले टॉफी नहीं; ग्रामीण छात्राओं की मदद करने का मौका देगा ये एप!

क्या आप दुकानदार से छुट्टे पैसो की बजाय चोकलेट दिये जाने से परेशान है? अब कुछ ही दिनों में आप छुट्टे पैसे ग्रामीण इलाके में पढने वाली लडकियों के शिक्षा के लिये दे सकते है। इस तरह का मोबाइल एप स्कूल में पढने वाली विद्यार्थीयो ने विकसित किया है।

‘तितलियां’ – युवाओं की एक पहल जो झुग्गी के बच्चों की बेरंग ज़िन्दगी में रंग भर रही है!

बच्चे, बचपन और उनके चेहरे की मुस्कान को बचाने के लिए रांची में युवाओं की एक टोली आगे आई है। तितलियां नाम की संस्था रांची के युवा बिजनसमैन अतुल गेरा ने स्थापित की है। इस संस्था से रांची के कई युवा जुड़े है जो गरीब बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए लगातार काम कर रहे है। मिलिए इन युवाओं की टोली से जो अपने जज्बे से रांची के झुग्गियों में रहने वाली बच्चियों की बेरंग जिंदगी में अपने जज्बे से रंग भर रहे है।

येरवडा जेल के किशोर अपराधियों को जीना सिखा रही हैं 21 वर्षीय नीतिका !

पुणे में एक छात्रों का समूह येरवडा जेल के किशोर अपराधियों के सुधार और कल्याण के लिए काम कर रहा है। इन बच्चों की काउंसलिंग से लेकर आत्मविशवास बढाने की गतिविधियों से इन्हें बाहरी दुनियां का सामना करने की ताक़त मिल रही है।

एक युवा का फेसबुक पेज कैसे हजारो बच्चो के चेहरे पर मुस्कान बिखरे रहा है!

सड़क पर जन्म लेने वाले और अपनी सारी जिन्दगी इन्ही सडको के किनारे बिता देने वाले अनाथ और बेसहारा बच्चो को कई बार अपने माता पता तक का पता नहीं होता तो अपने जन्मदिन दिन का पता होना तो बहुत दूर की बात है। पर एक शख्स ने, जन्मदिन का पता न होने पर भी इन बच्चो का जन्मदिन मनाने का एक बेहतरीन तरीका ढूंड निकाला है।

इ-ड्रॉपबॉक्स से अब बच्चे ऑनलाइन भी कर सकते हैं दुराचार की शिकायत !

देश में बच्चों के साथ दुराचार की घटनाएँ अक्सर सामने आती हैं, लेकिन उससे कई गुना अधिक घटनाएँ ऐसी होती हैं जो कहीं दर्ज ही नहीं की जातीं। उसका एक बड़ा कारण यह है कि ऐसे मामलों में दोषी बच्चों के परिवार का ही करीबी, रिश्तेदार या जानने वाला होता है, जिसके खिलाफ बच्चे डर और झिझक से कभी शिकायत नहीं करते। लेकिन अब इन्हीं मामलों पर शिकंजा कसने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और राष्ट्रीय बाल अधिकार सरंक्षण आयोग ने कमर कस ली है। बच्चो का सुरक्षा घेरा बढ़ाने के लिए मंत्रालय ने शिकायत करने का आसान और सुरक्षित तरीका बच्चों को दिया है।