डम्पिंग यार्ड से एक हरे-भरे पार्क के रूप में, माहिम नेचर पार्क का शानदार रूपान्तरण!

धारावी बस डीपो के पास स्थित माहिम नेचर पार्क कभी एक डम्पिंग यार्ड हुआ करता था, जहां पूरे मुंबई शहर से ला कर रोज़ सैकड़ो टन कचरा डाला जाता था। 1977 में प्रशासन द्वारा इसका उपयोग बंद कर दिये जाने पर तीन लोगों ने इसके स्वरूप को बदलने की ठानी और आज यह मुंबई शहर में प्रकृति प्रेमियो का पसंदीदा स्थान बन गया है।

पेशे से सीए रह चुकी देविका, पशुओं के संरक्षण के लिए बना रही है चमड़ा-मुक्त जूते!

पशुओं के प्रति प्रेमभाव रखने वाली देविका ने जब भारत में चमड़े और कैनवस जूतो के बीच की खाई को देखा तो उन्होने अपना पेशा छोड़ हमे चमड़े की जगह एक बेहतर उत्पाद उपलब्ध कराने की ठानी और अपना खुद का एक  ब्रांड स्थापित किया।

एक घर जो एकत्रित करता है वर्षा का जल और उत्पादित करता है सौर ऊर्जा, आर्गेनिक भोजन और बायोगैस।!

चेन्नई के किलपाक इलाके में 17 वासु स्ट्रीट पर एक पूर्ण नियोजित घर स्थित है। सौर ऊर्जा से भरपूर इस घर में अपनी बायोगैस इकाई, जल-संचयन इकाई और खुद का किचन गार्डन है। इस घर की प्रसिद्धि इन अनूठे तरीकों को विकसित करने वाले इसके मालिक के कारण है।

शहर के थकान भरे अस्त-व्यस्त जीवन को छोड़ इस परिवार ने केरल में रखी प्रदूषण मुक्त गाँव की नींव!

ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण के बढ़ते कहर के बारे में जहाँ एक तरफ हम सिर्फ चिंता कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केरल के कुछ परिवार जुटे हैं एक जैविक गाँव बनाने में। मोहन चावड़ा के मार्गदर्शन में बन रहा यह गाँव एक प्रेरणा हैं आने वाली पीढ़ियों को एक खूबसूरत दुनिया सौंपने का और बेहतर भारत बनाने का।

हर एक पेड़ को लोहे की कीलो और इश्तहारो से मुक्ति दिला रहे है अहमदाबाद के युवा!

गुजरात के अहमदाबाद शहर के कुछ युवाओं ने मिलकर' हाइली एनेरजाइस्ड यूथ फॉर हेल्पिंग इंडीयंस' (HeyHi) नामक एक संस्थाकी शुरुआत की है। यह संस्थाशहर भर के पेड़ो के संरक्षण के मुहीम में जुटा हुआ है।

छत्तीसगढ़ के इस अंग्रेजी मीडियम स्कूल की फीस है बस एक पौधा!

छ्त्तीसगढ़ के एक गांव में एक स्कूल बिना फीस के बच्चोंं को बेहतर शिक्षा दे रहा है, और बदले में फीस के तौर पर अभिभावकों को एक पौधा लगाना होता है।

गणपति की 5 ऐसी मूर्तियाँ, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाएंगी!

गणेश चतुर्थी आने वाली है और लोग गणपति की मूर्तियों की खरीदारी में जुट चुके हैं। ये मूर्तियाँ प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की बनी हुई होती हैं जो स्वाभाविक तरीके से पानी में घुलती नहीं हैं और इन्हें पेंट करने वाले रंग भी पर्यावरण को दूषित करते हैं। इन नुकसानों को ध्यान में रखते हुए कई लोग और संगठन इसका विकल्प ढूंढने में लगे हैं और कुछ इसमें सफल भी हुए हैं।

शहीदों की याद में एक साल में एक लाख दस हज़ार पौधे लगा चुकी है ये गृहणी; आर्मी ने दिया साथ!

दिल्ली में रहने वाली 52 वर्षीय गृहिणी राधिका एक साल में अब तक एक लाख दस हजार फलो के पेड़ लगा चुकी हैं। इनमें आम, इमली, जामुन और कटहल के पेड़ शामिल हैं, जो उत्तर भारत, राजस्थान और महाराष्ट्र के आर्मी क्षेत्रों में लगाए गए हैं। इस कार्य को पूरा करने के लिए राधिका ने कुछ अपनी पूंजी और कुछ अपने मित्रों से आर्थिक सहायता प्राप्त की है और अब आर्मी भी उनके साथ है।

क्यूँ कभी बीमार नहीं पड़ते हरी और आशा – जाने इनकी जीवनशैली !

बाहर का तापमान 40 डिग्री होने के बावजूद भी यह दम्पति एक ऐसे घर में रह रहा है, जहा एक भी पंखा नहीं है। यह जगह एक जंगल की तरह विकसित है जहाँ किसी भी तरह का शहरी शोरगुल नहीं है। इन लोगों ने अपने लिए एक ऐसा माहौल बनाया है जो प्रकृति के बेहद करीब है। और इनकी इस कठोर परिश्रम का फल इन्हें अपने अच्छे स्वास्थ्य के रूप में मिला है। पिछले 17 सालो में इस दंपत्ति को एक बार भी दवाई की ज़रूरत नहीं पड़ी है।

साठ बर्षो से जल, जंगल और जमीन बचाने की मुहीम चला रहा है झारखंड का ये वाटरमैन !

बीते 60 वर्ष से सिमोन की जिंदगी में कुछ भी नहीं बदला लेकिन हजारों गांव वालों की जिंदगी में बदलाव लाने का श्रेय इस शख्स को जाता है। 84 साल की उम्र में भी सिमोन ऊरांव सुबह साढ़े चार बजे उठकर खेत और जंगल की ओर निकल पड़ते है, कई तरह की मुसीबतों का सामना कर सिमोन ने अपने गांव के पास सालों पहले पौधारोपण किया था , जो आज जंगल का रूप ले चुके है और रोजाना सुबह उठकर वो इन पेड़ों और पौधो की एक झलक लेने निकल जाते है।

अनपढ़ होते हुए भी किंकरी देवी ने जलाई शिक्षा और पर्यावरण के प्रति जागरूकता की मशाल !

किंकरी देवी - हिमाचल प्रदेश की एक ऐसी पर्यावरण की रक्षक जिन्होंने चूना-पत्थर खदानों के खिलाफ एक जंग छेड़ी। सिमौर जिले की रहने वाली इस साधारण महिला ने जब खदानों के कारण वातावरण में हो रहे दुष्परिणामो को देखा तो अनपढ़ होने के बावजूद, इन खदानों के मालिको को वो कोर्ट तक ले कर गयी। आइये जानते है इनके संघर्ष और बहादुरी की कहानी।

एक व्यक्ति जिसने केरल में ३२ एकड़ बंजर ज़मीन को बना डाला एक लहलहाता जंगल !

ज़ों ज़्योनो द्वारा १९५३ में लिखी गयी कथा "द मैन हू प्लांटेड ट्रीज " एल्ज़ार्ड बूफीये नामक एक चरवाहे की कहानी है जिसने समस्त अल्पाइन घाटी में वृक्षारोपण कर, एक वन का पुन्हनिर्माण कर, उसे सजीव कर डाला था। यह तो हमें ज्ञात नहीं कि बूफीये कोई काल्पनिक किरदार है या वास्तविक, परन्तु इस कथा की तर्ज़ पर केरला के कासरगोड़ ज़िले में रहने वाले एक व्यक्ति ने यथार्थ में यह कर दिखाया। एक व्यक्ति जिसने बत्तीस एकड़ बंजर भूमि खरीद कर उसपर वृक्षारोपण किया और उसे हरा-भरा बना डाला।

पर्यावरण को बचाने के साथ-साथ, कचरा उठाने वाले अब करेंगे सम्मानपूर्ण नौकरी !

आर्थिक विकास और शहरीकरण की देन है, हर तरफ लगा कचरे का अम्बार। पर एक एनजीओ प्रयासरत है कचरे को बेहतर तरीके से ठिकाने लगाने में हमारी मदद करने में , कचरा उठाने वालों को बेहतर जीवन प्रदान करने में और कचरे को रीसायकल (दुबारा इस्तेमाल करने लायक) कर के वातावरण को साफ रखने में।