कैंसर ने दृष्टि छीनी, पर आईएएस बनने के सपने की ओर बढ़ रही हैं नागपुर की भक्ति घटोळे!

नागपुर की भक्ति घटोळे की नौ साल की उम्र में ही कैंसर ने दृष्टि छीन लीं, लेकिन फिर भी उनके सपने और जुनून ने उन्हें रुकने नहीं दिया और आज भक्ति सफलता के स्तम्भ स्थापित करते हुए अपने आइएएस बनने के सपने की ओर बढ़ रही हैं।

4 सर्जरी और 500 स्टिचस के बाद भी, ये प्रेरक नेवी ऑफिसर हैं वापसी को तैयार।

मौत का सामना करा देने वाली दुर्घटनाओं से गुजरना हमेशा ही एक बुरे सपने की तरह होता है। बिनय कुमार, एक पूर्व नेवी ऑफिसर ने भी ऐसी ही एक दुर्घटना का सामना किया लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी और अपने इसी शानदार जज्बे के चलते अब वो वापसी को तैयार है।

‘मुझे सामान की तरह उठाया गया’- एक दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ता की आपबीती से उठी सुविधाजनक रेलवे की मांग!

विराली दिव्यांग अधिकारों की सशक्त कार्यकर्ता हैं। वे लेखिका और अभिनेत्री होने के साथ साथ 2014 की मिस व्हीलचेयर रनर-अप भी रही हैं। उन्हें भारतीय रेलवे के साथ कई बार संघर्ष करना पड़ा, जहां उन्हें दिव्यांग होने की वजह से मजबूरी में पुरुषों द्वारा उठाया गया। विराली अपने साथ घटी इन घटनाओं को बन्द करवाना चाहती हैं।

देहरादून में एक स्कूल के माध्यम से 1500 खास बच्चों की जिंदगी संवार रही है ये दो सहेलियां!

देहरादून में खास जरूरत वाले बच्चों को जिंदगी जीने का तरीका सिखाते दो दोस्त - जो म्क्गोवान और मंजू की कहानी| 1996 में मंजू सिंघानिया और जो म्क्गोवान चोपड़ा ने एक ख़ास स्कूल की शुरुआत की थी जो ख़ास जरूरत वाले बच्चों के लिए था| अपनी इन कोशिशों से वो अब तक 1500 से भी ज्यादा बच्चों की जिंदगी को बेहतर बना चुके हैं| हालांकि, शुरुआत में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, पर अब जा कर उनकी मुहिम रंग लाई है| उनके इस संघर्ष और प्रयासों को जानने के लिए पढ़े उनकी ये बेहतरीन दास्तां|

गरीबी से लेकर अपंगता भी नहीं रोक पाई मरियप्पन को स्वर्ण पदक जीतने से!

हम असफलता के बहाने खोजते हैं, कभी अपनी रूकावट का दोष परिस्थितियों को, तो कभी हादसों के सिर मढ़ते रहते हैं। परिस्थितियों और हादसों से लड़कर मंजिलें पाने वालों को देखकर हमें एहसास होता है कि इनके मुकाबले हमारी परिस्थितियां तो कुछ भी नहीं थीं। ऐसी ही कहानी है हमारे नायक मरियप्पन की जिन्होंने पैरालंपिक में भारत को एतिहासिक पदक दिलाया।

आपको सुकून की चाय और मूक बधिरों को रोज़गार देता रायपुर का ‘नुक्कड़ चाय कैफ़े’!

रायपुर के नुक्कड़ चाय कैफ़े में आपका स्वागत है । यहाँ समय बिताने का मतलब सिर्फ चाय का लुत्फ़ उठाना ही नहीं है बल्कि उस से भी कुछ ज्यादा है । यहाँ पर गुजरने वाला समय आपको सांकेतिक भाषा सिखाएगा, किताबो के पन्नो में ख़ुद डूबाना सिखाएगा, कुछ कवितायें गुनगुनाना सिखाएगा, अपने जैसे दूसरे लोगों से आपको मिलवायेगा और नए लोगों के साथ दोस्ती करवाएगा !

बिना हाथों के इस युवक ने तैराकी में जीते तीन स्वर्ण पदक!

हौसले की उड़ान बिना परों के होती है। बेशक़ तिनके का भी सहारा न हों जूनून उफनते पानी को पार कर ही जाता है। कुछ ऐसी ही कहानी है हमारे आज के नायक, विश्वास की। जिनका खुद में विश्वास उन्हें लाख मुश्किलों के बीच से निकाल कर आज दुनियां के शिखर पर ले आया है।

रांची में नेत्रहीन छात्राओं को स्कूल दे रहा कॉल सेंटर की ट्रेनिंग !

बृजकिशोर नेत्रहीन विद्यालय में छात्राओं को कॉल सेंटर में काम करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जल्द ही अब कॉल सेंटरों की बागडोर ये नेत्रहीन लड़कियां संभालेंगी। यह पूर्वी भारत का पहला और देश का दूसरा ऐसा नेत्रहीन बैच होगा जो कॉल सेंटर में आपकी मोबाइल सेवाओं संबंधी समस्याओं का समाधान करेगा।

हाथ नहीं है इसलिए पैरों से डालते हैं वोट, केरला के आब्दु समद !

हम सब बदलाव की बात तो बहुत करते हैं, लेकिन जब बदलाव के लिए कदम उठाने का असल वक्त आता है तो घर बैठकर छुट्टी मना रहे होते हैं। हर दिन खीज और झल्लाते परिस्थितयों को बदलने के लिए हम एक बटन दबाने के लिए घरों से नहीं निकलते हैं।

दोनों हाथो और पैरो को गंवाकर भी नहीं गंवाया हौसला – दौड़ी 10 किमी मैराथन !

शालिनी सरस्वती के दोनों हाथ-पैर नहीं हैं लेकिन वे मैराथन में दौडी हैं। शालिनी ने रविवार को 'TCS World 10K' में दस किलोमीटर की रेस दौड़ी है।

हाँ, मुझे सेरिब्रल पाल्सी है पर मैं आप सभी से अलग नहीं हूँ !

बचपन से ही सेरिब्रल पाल्सी से गेअस्त राजवी ने कभी अपनी शारीरिक कमी को अपनी इच्छाशक्ति के आड़े नहीं आने दिया। जीवन के कई उतार चढ़ाव और संघर्षो से जूझने के बाद आज राजवी स्वयं अपने पैरो पर कड़ी है और लाखो लोगो के लिए एक मिसाल है !

अपंगत्व को मात देकर अभिषेक ठावरे बन गया है भारत का पहला तिरंदाज जो दातों से कमान खीचता है!!!

नसीब ने उसका दायिना हाथ और पैर छिनकर उसे हरा दिया था पर अभिषेक ठावरे नसीब को मात देकर भारत का दातों से कमान खिचनेवाला पहला तीरंदाज (टीथ आर्चर) बन गया।

दोनों हाथ खोने के बाद भी, जम्मू-कश्मीर स्टेट क्रिकेट टीम के लिए खेलते है आमिर!

आमिर हुसैन लोन उस वक्त महज़ आठ साल के थे जब एक दुर्घटना में उन्हें अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े। आज, २६ वर्ष की आयु में, वह जम्मू कश्मीर की राज्य पैरा क्रिकेट टीम (state para-cricket team) के कप्तान है।

आई आई टी खडगपुर के छात्रों ने बनायी, विकलांगो की सहूलियत के लिए बिना ड्राईवर की बाइक!

जो लोग विकलांग होने के कारण स्टीयरिंग या पेडल नहीं चला सकते, उनके लिए साइकिल स्टेशन बनाने के लिए और वातावरण के मसलों को सुलझाने के लिए आई आई टी खड़गपुर के छात्रों ने बिना ड्राईवर की बाइक बनाई है। आइये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।