बिना मिट्टी के खेती की इस अनोखी तकनीक से संकट से उबर सकते है किसान!

कनिका ने क्लेवर बड की स्थापना की है, जो खेती करने के ऐसे तरीके पर काम करती है, जिससे न सिर्फ फसलों की गुणवत्ता अच्छी होती है, बल्कि फसलें कहीं भी कभी भी आसानी से उगाई जा सकती हैं और वो भी बिना कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग के। इतना ही नहीं फसलें बिना मिट्टी के भी उगाई जा सकती हैं।

पेशे से सीए रह चुकी देविका, पशुओं के संरक्षण के लिए बना रही है चमड़ा-मुक्त जूते!

पशुओं के प्रति प्रेमभाव रखने वाली देविका ने जब भारत में चमड़े और कैनवस जूतो के बीच की खाई को देखा तो उन्होने अपना पेशा छोड़ हमे चमड़े की जगह एक बेहतर उत्पाद उपलब्ध कराने की ठानी और अपना खुद का एक  ब्रांड स्थापित किया।

एक घर जो एकत्रित करता है वर्षा का जल और उत्पादित करता है सौर ऊर्जा, आर्गेनिक भोजन और बायोगैस।!

चेन्नई के किलपाक इलाके में 17 वासु स्ट्रीट पर एक पूर्ण नियोजित घर स्थित है। सौर ऊर्जा से भरपूर इस घर में अपनी बायोगैस इकाई, जल-संचयन इकाई और खुद का किचन गार्डन है। इस घर की प्रसिद्धि इन अनूठे तरीकों को विकसित करने वाले इसके मालिक के कारण है।

किसानों की समस्या को ही बना दिया समाधान, सूखे और भारी बारिश के लिए खोजी अनोखी तकनीक

हमारे देश में खेती के लिए लम्बे समय तक बारिश न होने या अचानक बेमौसम होने वाली बारिश से फसलों की बर्बादी होती है जिसकी मार किसान को झेलनी पड़ती है। लेकिन इसका समाधान निकाला अहमदाबाद की एक सामाजिक संस्था ने अनौखी जल सरंक्षण प्रणाली खोजकर!

भारत ने विकसित किया कुष्ठ रोग से बचाने वाला दुनियां का पहला टीका!

कुष्ठ रोग के खिलाफ भारत ने बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। भारत ने कुष्ठ रोग से छुटकारा पाने के लिए दुनिया का पहला टीका विकसित कर लिया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि से भारत कुष्ठ रोग से लड़ाई में मजबूत होगा।

छुट्टे पैसे के बदले टॉफी नहीं; ग्रामीण छात्राओं की मदद करने का मौका देगा ये एप!

क्या आप दुकानदार से छुट्टे पैसो की बजाय चोकलेट दिये जाने से परेशान है? अब कुछ ही दिनों में आप छुट्टे पैसे ग्रामीण इलाके में पढने वाली लडकियों के शिक्षा के लिये दे सकते है। इस तरह का मोबाइल एप स्कूल में पढने वाली विद्यार्थीयो ने विकसित किया है।

थोड़ी मेहनत, थोड़ा शोध और आम लोगो के लिए इस छात्र ने बनाया सिर्फ रु.1500 का वाटर प्यूरीफायर !

रक्षित प्रधान ने गन्ने तथा नारियल जटा जैसी सामग्रियों को इकठ्ठा कर, पानी को शुद्ध करने का एक ऐसा यन्त्र तैयार किया है जिसे कई लोग कम कीमत पर खरीद पायेंगे।

केरल के एक छोटे से गाँव से निकल सौ करोड़ की कंपनी के मालिक बनने का सफ़र!

ये कहानी है पी सी मुस्तफा की जो एक छोटे से गाँव से है जहां बिजली तक नहीं थी। पिता चौथी तक पढ़े, माँ कभी स्कूल गई ही नहीं और वे खुद छटवी में फेल हो गए पर इसके बाद मुस्तफा ने एनआईटी, कोलकाता से लेकर आई आई एम बेंगलोर से पढाई की और सौ करोड़ का कारोबार खडा कर लिया।ऐसी कहानियां हमारे निराश मन के इंजन में ईंधन का काम करती हैं। और हम प्रेरित होकर खुद ब खुद चल पड़ते हैं।

मजदूर माँ के जल जाने पर १३ वर्षीय बेटे ने बनाया एक सस्ता अग्नि रोधक यंत्र !

तमिलनाडु में बसा सिवाकासी वहां के पटाखो के कारखानों का केंद्र है। यह पूरे देश की ९० प्रतिशत पटाखों की मांग को अकेले पूरा करने वाला क्षेत्र है। यही कारण है कि यह कई दुर्घटनाओ का भी केंद्र बना हुआ है ।

आई आई टी खडगपुर के छात्रों ने बनायी, विकलांगो की सहूलियत के लिए बिना ड्राईवर की बाइक!

जो लोग विकलांग होने के कारण स्टीयरिंग या पेडल नहीं चला सकते, उनके लिए साइकिल स्टेशन बनाने के लिए और वातावरण के मसलों को सुलझाने के लिए आई आई टी खड़गपुर के छात्रों ने बिना ड्राईवर की बाइक बनाई है। आइये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

सिर्फ ५० रुपये में गले के कैंसर से पीड़ित लोगो को ठीक कर रहे है बंगलूरू के डॉ. राव !

बंगलूरू स्थित डॉ. विशाल राव ने एक ऐसे चिकित्सा यंत्र की खोज की है जिससे गले के कैंसर से पीड़ित लोग सर्जरी के बाद भी ठीक से बोल सकते है। और इस यंत्र की क़ीमत सिर्फ ५० रूपये है।

सेरेब्रल पाल्सी होने के बावजूद विकलांग कोटा की नौकरी ठुकरा कर दो कंपनियों के निर्माता बने अजीत बाबू !

सेरेब्रल पाल्सी और डिस्लेक्सिया होने के बावजूद आज अजीत बाबू है दो सफल कंपनियों के निर्माता - आईये जाने उनके इस प्रेरणादायी सफ़र के बारे में !

अब आप ले सकते है मुंबई की टैक्सी में सफ़र का मज़ा भी और सीख सकते है एक अनोखी भाषा भी!

टैक्सी के फैब्रिक पर भारतीय सांकेतिक भाषा को अंकित करना बेहद ही रचनात्मक कल्पना है। आइये आज हम ऐसे ही एक डिज़ाइनर के बारे में जानते है जिसका मक्सद इस भाषा को प्रचलित करना ही नहीं बल्कि लोगो में इसे सिखने की चाह बढ़ाना भी है।

बिना किसी डिग्री के छोटे छोटे आविष्कार करके गिरीश बद्रगोंड सुलझा रहे है किसानो की मुश्किलें !

बीजापुर जिल्हे के २८ वर्षीय गिरीश बद्रगोंड २००६ जब बंगलुरु आये, तब उनके साथ एक लैपटॉप, वायरलेस राऊटर और जेब में कुछ पैसे थे। पर आज उन्होंने कृषि क्षेत्र में काम आने वाले कई उपकरणों का आविष्कार करके खेती- किसानी को एक नयी राह दिखाई है।