सन १८९३ में जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने देशवासियों को एकत्रित करने के लिए गणेशोत्सव को सार्वजानिक रूप से मनाने की सोची होगी, तब उन्होंने भी इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि इस उत्सव का सदुपयोग कुछ इस प्रकार भी किया जा सकता है।

हर साल न जाने कितने त्योहारों में मंदिरों में चढ़ावे के रूप में ढेर सारे पैसे इकट्ठे होते हैं और त्यौहार खत्म होने पर उसका एक हिस्सा बचा रह जाता है, और इस वर्ष का गणेशोत्सव भी कुछ अलग नहीं था। लेकिन हैदराबाद के पंडाल समिति और पुलिस अधिकारियों ने कुछ अलग करने का सोचा।  उन पैसों से वे ६ अनाथालयों में रहने वाले करीबन २५०  बच्चों की मदद् करने चल पड़े।

वनस्थलीपुरम पुलिस ने स्थानीय पंडाल समितियों के साथ मिल कर गणेश चतुर्थी के बाद बचे पैसों को अनाथालयों के बच्चों की भलाई के लिए इस्तेमाल करने का सोचा।

हैदराबाद में स्थित इस इलाके में अधिकारीयों ने
छः अनाथालयों के २५० बच्चों के लिए कपड़े,किताबें,जूते, स्टेशनरी का सामान, खेलकूद का सामान और दूसरी जरूरी चीजें खरीदी।

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प्रतीकात्मक तस्वीर स्रोतःC.K. Koay/FLickr

पुलिस अधिकारीयों ने ३० पंडाल समितियों के साथ सितम्बर में मीटिंग की और पता लगाया की वह हर साल त्योहार के बाद बचे पैसों  का क्या करते हैं। इस साल भी लगभग २ लाख रूपये जमा हुए थे, और  उन पैसों से बच्चों के जरूरत का सामान खरीदा गया और शनिवार को बच्चों के बीच में बांटा गया।

इसके अलावा उनके लिए एक निःशुल्क स्वास्थ शिविर भी आयोजित किया गया।

जिन अनाथालयों को चन्दा दिया गया वे मातृश्री, सीरिया, गीतांजली, सिदुर, ग्रेसियस पैराडाइज और रे ऑफ होप हैं।

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