प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हाल ही में उद्घाटन किया गया चंडीगढ़ हवाई-अड्डा देश का पहला हवाई-अड्डा है,  जो सरकार के -मेक इन इंडिया कैंपेन का एक बहोत अच्छा उदाहरण बन सकता है। क्योंकि यह हवाई अड्डा पर्यावरण संरक्षण  की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है।

आइए देखते हैं वो कौन सी खासियते हैं जो इस हवाई अड्डे के निर्माण और उसके सुचारू रूप से चलाये जाने में पर्यावरण संरक्षण में भी खरे उतरते हैं !

ड्राइंग बोर्ड की अवस्था में ही यह तय कर लिया गया था कि इस एयरपोर्ट को जितना हो सके उतना पर्यावरण के अनुकूल बनाया जाएगा। विश्व के किसी भी कोने में आप हवाई अड्डों  को देखे, तो एक बात जो स्पष्ट रूप से उभर के  सामने आती है  वो यह है कि  लगभग सभी हवाई अड्डे कृत्रिम प्रकाश (artificial lights) का इस्तेमाल करते है। इससे आपको  समय का पता ही नहीं चलता।

पर चंडीगढ़ के एयरपोर्ट में ऐसा नहीं होगा। इस एयरपोर्ट को पूरी तरह पारदर्शी बनाया गया है और इसलिए सूरज ढलने तक इसमें किसी भी दुसरे बनावटी रौशनी का उपयोग नहीं होगा।

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इस पारदर्शिता की वजह से  निर्माताओं ने इसे  ४ सितारा रेटिंग प्रदान करवाने के लिए  ऊर्जा नवीकरण मंत्रालय को आवेदन भी प्रस्तुत किया है।

हवाई अड्डे की छत पर एक २०० KW का सौर संयंत्र लगाया गया है, जो प्रमुख हवाई अड्डे की बिजली की जरूरत को काफी हद तक पूरा करता है। और फ्लोट ग्लास की जिस किस्म का इस्तेमाल किया गया है इससे अन्दर ज्यादा गर्मी भी नहीं होती। फ्लोट गिलास की इमारतों की एक खराबी होती है कि उनमे बहोत गर्मी होती है। इस गर्मी  को कम करने के लिए ज्यादा ऐयरकण्डीशनिंग की ज़रूरत होती है- पर इस एयरपोर्ट में ऐसा नहीं होगा।

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वास्तव में इस हवाई अड्डे के निर्माण में ऊर्जा दक्षता को एक मार्गदर्शक के मूल सिद्धांत के रूप में प्रयोग  किया गया है। एयरपोर्ट के अंदर जितने भी प्रकाश उपकरण लगाये गए हैं उनका ४० % हिस्सा एलईडीस या लाइट एमिटिंग डायोड्स हैं  हवाई अड्डे की एयर कंडीशनिंग चिलर कुशल मशीनों से प्रदान किया जाता है।

यह शायद विश्व का पहला हवाई अड्डा हो सकता है जहाँ  हवाई अड्डे के अंदर एक लॉन बनाया गया है। है न गर्व की बात !

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निर्माण कंपनी एल एंड टी द्वारा निर्मित, एयरपोर्ट को बनाने में लगभग ५५ लाख फ्लाई ऐश ईंटों या कि राख से बनी हुई ईंट ( वो राख जो कि थर्मल पावर प्लांट से निकलती है, और पर्यावरण को प्रदूषित करती है ) का प्रयोग किया गया है।

पानी को बचाने के लिए सेंसर आधारित पाइप लाइन प्रणाली, गुहा दीवार, डबल इंसुलेटेड छत, ऊर्जा कुशल चिलर्स जैसे अभिनव प्रयोग के द्वारा यह एयरपोर्ट हरी प्रौद्योगिकियों के साथ स्थिरता में एक नया बेंचमार्क तय करेगा। सार्वजनिक स्थान में एक सिविल इमारत में फ्लाई ऐश ईंट के इतने बड़े पैमाने पर उपयोग वास्तव में निर्माण में फ्लाई ऐश ईंटों के प्रयोग को और बढ़ावा देगा, और परोक्ष रूप से पर्यावरण को बचाने में एक अहम भूमिका निभा सकता है। क्योंकि जितनी  ज्यादा संख्या में फ्लाई ऐश ईंटों का प्रयोग बढ़ेगा उतना ही उर्वर मिट्टी जो अन्यथा ईंट बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है, को बचाया जा सकेगा।

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पर वो कहते हैं न कि चाँद है तो चाँद के माथे पे कोई न कोई दाग भी लग ही जाता है, तो ऐसा ही कुछ चंडीगढ़ एयरपोर्ट के साथ भी हुआ है।

उम्मीद यह की जा रही थी कि जिस ईमारत की इतनी विशेषतायें है उसकी पहचान के लिए एक विशिष्ट नाम भी सोच लिया गया होगा, पर नाम क्या हो यही  बहस का मुद्दा बन कर रह गया है।

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पंजाब सरकार यह चाहती है कि कि इसका नाम शहीद भगत सिंह के नाम पर रखा जाये पर उसके साथ मोहाली नाम भी जोड़ा जाये। पर मोहाली नाम जोड़े जाने से हरियाणा सरकार को गुरेज है। और वो उसे चंडीगढ़ एयरपोर्ट के नाम से ही जानना चाहती है।

गौर तलब  है कि शहीद भगत सिंह पूरे देश की धरोहर हैं और उत्तर भारत में इस तरह की एक बेमिसाल ईमारत को उनके नाम से जाना जाये, इससे बढ़िया श्रद्धांजलि इस शहीद को नहीं दी जा सकती, और उम्मीद यही की जाती है कि पंजाब और हरियाणा दोनों ही सरकारें शीघ्र ही इस मुद्दे को सुलझा लेंगी अन्यथा शेक्सपियर का वक्तव्य- नाम में क्या रखा है- एक कटाक्ष की तरह सालता रहेगा कि वाकई नाम क्या हो इसी में सब कुछ रखा है।

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