अंडर द म्यंगो ट्री (UTMT) ने फसल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मधुमक्खी पालन की शुरुवात की। कम खर्चे वाली इस तकनीक ने फसल को दोगुना करने जैसा अदभुत करिश्मा करके दिखाया।

गुजरात के वलसाड जिले में रहने वाले भारतभाई ने १८ साल की उम्र में मधुमक्खीपालन की शुरुवात की। आज २५ साल की उम्र में वो सबसे कम उम्र के युवा मुख्य प्रशिक्षक है।

पहले वो बारिश से सिंचित फसल जैसे चावल, नाचनी(रागी) और काला चना की खेती करते थे। मधुमक्खीपालन का प्रशिक्षण लेने के बाद भारतभाई ये जान गये कि मधुमक्खी परागण के लिये अहम् भूमिका निभाते है।  और उनसे फसल में बढोत्तरी भी होती है। उन्होंने फसल के साथ साथ मधुमक्खी पालना शुरू किया और आज मुख्य फसल के साथ वो अन्य फसल जैसे सन्न हेम्प, प्याज, निगेर और चना का भी उत्पादन करते है।

मधुमक्खी परागण की वजह से भारतभाई के फसल में ८०% की बढोत्तरी हुयी है। एक साल में उन्होंने ७७०० रुपयों की अतिरिक्त कमाई भी की है।

Bharatbhai has see a great increase in his harvest.

भारतभाई को फसल में बढोत्तरी दिखाई दी।

भारतभाई कहते है, “बरसात के मौसम में शहद बेचकर हम अतिरिक्त कमाई कर लेते है।” शहद और फसल में बढोत्तरी की वजह से एक साल में भारतभाई के आय में ४०% का मुनाफा हुआ है।

आम के पेड़ लगाने वाले किसानो को मधुमक्खीपालन का कितना फायदा हुआ है ये इसका अच्छा उदाहरण है। भारत में गाँव के लोग खेती-बाड़ी पे निर्भर है इसलिए खेती से जुड़े नये तकनीक का अविष्कार होना, बहोत ही महत्वपूर्ण है। इसलिए UTMT ने मधुमक्खीपालन जैसे तकनीक की शुरुवात की है। इस पहल की शुरुवात उन्होंने सन २००९ में की थी और आज तक वो खेती के लिये उपयुक्त साबित हो रही है।

शुरुवात

श्रीमती विजया पस्ताला, सह- संस्थापक UTMT, जब इस विषय पर जानकारीप्राप्त करने लगी तब उन्हें ये पता चला कि भारत में अच्छे प्रति का शहद मिलता है फिर भी लोग बाहरी देश से इसे आयात करते है।

श्रीमती सुजाना कृष्णमूर्ति, सह- संस्थापक UTMT कहती है,

“इसके बारे में ज्यादा पता ना होने के और बाज़ार में भी जानकारी ना होने के कारण भारतीय किसान मधुमक्खीपालन को एक सक्षम पर्याय नही बना पाए है ।”

टीम ने जब अनुसन्धान किया तब उन्हें ये पता चला की शहद के लिए भारत में बाज़ार है और मधुमक्खीपालन,परागण और फसल के लिये उपयुक्त है। ८४% भारतीय किसान छोटी-मोटी खेती करते है।  मधुमक्खीपालन उनके फसल को बढाता है और साथ में अधिक उत्पादन भी देता है।

Shardatai, a farmer, too handles bees with expertise.

शारदा ताई अच्छी तरह से इस उपक्रम का उपयोग कर रही है।

श्रीमतीकृष्णमूर्ति समझाती है –

“शुरू शुरू में किसानो को ये समझाना मुश्किल था की मधुमक्खीयो को डिब्बे में कैसे रखते है। पर धीरे धीरे, जब उन्हें सिखाया तो उन्हें ये कल्पना अच्छी लगी और उन्होंने भी इसे अपनाने की ठान ली”

मधुमक्खीपालन इस तरह से काम करता है।

UTMT भारत के ३ राज्यो में इस्तेमाल हो रहा है। अब तक ३००० किसानो ने इसका उपयोग करके अपने फसल में बढोत्तरी की है।

UTMT मॉडल उसके जैसे अन्य कार्यक्रम से भिन्न है। अन्य संस्था किसानो को शिक्षा केंद्र में इस प्रयोग के बारे में बताते है पर UTMT इस उपक्रम के बारे में किसानो को उनके खेत पर समझाते है और १२ महीनो तक प्रशिक्षण भी देते है।

bee keeping

मधुमक्खीपालन न सिर्फ कम खर्चे में होता है बल्कि इससे अतिरक्त आमदनी भी होती है।

श्रीमतीकृष्णमूर्ति कहते है –

“इस मॉडल के बारे में आने वाले सभी प्रश्न और कठिनाओ के समाधान किसान सीखते सीखते ढूँढ लेते है”

UTMT के ६० मुख्य प्रशिक्षक १२ महीने मधुमक्खीपालन के बारे में आने वाले सभी प्रश्नों को सुलझाने के लिये किसानो को उनके खेत पर ही सहायता करते है।मधुमक्खी पालना, शहद निकालना और बारिश में इनकी देखभाल करना इन सभी प्रक्रिया में किसानो का सहभाग होता है।

हर एक किसान को २ से ४ बॉक्स और प्रत्येक बॉक्स में ३० से ४० हजार मधुमक्खीया दी जाती है। मधुमक्खीया खुद की देखभाल स्वयं करती है इसलिए किसानो को ज्यादा ध्यान देना नहीं पड़ता है।

मधुमक्खीयो का बॉक्स और साल भर के ट्रेनिंग का खर्चा मिलाके किसान को सिर्फ १०००० रुपये देने पड़ते है। १-२ साल में किसान शहद बेचके इस पुरे किट का पैसा वसूल कर लेते है।

bee keeping

बिजन्हाई ग्राम, मध्य-प्रदेश की किसान औरते इस उपक्रम का इस्तेमाल अच्छी तरह से कर रही है।

UTMT अन्य NGO के साथ मिलकर इस कार्यक्रम को किसानो तक पंहुचा रहे है। BAIF और अन्य NGO के साथ मिलकर UTMT किसानो की मदत कर रहे है।

परिणाम

श्रीमती कृष्णमूर्ति कहती है –

“मधुमक्खीपालना बहोत ही नाजुक और कठिन है।मधुमक्खीयो को सँभालते वक्त आपको बेहद सचेत रहना पड़ता है। इसलिए एक सक्षम ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है।”

जब इस उपक्रम की शुरुवात हुयी तो किसानो ने इसे जल्दी नही अपनाया। पर जब इसके परिणाम अच्छे दिखे तब सब लोगो ने इसका स्वागत किया। जो खेत पहले २० कि.ग्रा. आम का उत्पादन करते थे वो आज ३० कि.ग्रा. तक का उत्पादन कर रहे है। मधुमक्खी परागण से अन्य उत्पादन जैसे फल और सब्जी में भी बढोत्तरी दिखाई दी है।

अन्य संस्थाओ की मदद

UTMT ने हाल ही में MIF’s Social Innovation Acceleration Program (MIF-SIAP) के तहत Marico Innovation Foundation के साथ मिलकर इस उपक्रम को किसानो तक पहुचाने का निश्चय किया है।

MIF परागण सेवा को सक्षम बनाने के लिये नयी कल्पनाये, सुझाव और तकनीक इस्तेमाल करके गरीब से गरीब किसानो तक इसका प्रसार कर रही है।

श्रीमती कृष्णमूर्ति ने श्री मारीवाला, Marico Ltd से मिलने के बाद कहा –

“UTMT में श्री मारीवाला से मिलने का हमारा अनुभव बेहद ही सुखद था।

२०१३ में World Bank Development Marketplace award संस्था ने विश्व के सबसे २० परिणामकारक उपक्रमों में मधुमक्खीपालन का उल्लेख किया है। खेती –बाड़ी के संदर्भ में श्री मारीवालाजी ने उठाया हुया ये कदम काबिल ए तारीफ है। उनके हिसाब से मधुमक्खीपालन न सिर्फ गरीब किसानो तक पहुचना चाहिए, बल्कि सभी किसान इसे अतिरिक्त आमदनी का एक अच्छा पर्याय समझे और अन्य फल, सब्जी की उत्पादन क्षमता बढाने के लिये इसका उपयोग करे। ”

उत्पादन

किसानो के साथ नजदीक से काम करने के बाद श्रीमती कृष्णमूर्ति को लगता है कि ये उपक्रम किसानो के लिये बेहद ही लाभदायक है। इससे पुरे कृषि व्यवसाय में एक सकारात्मक बदलाव होगा और गरीब किसान बेहतरीन जिंदगी गुजार सकेंगे।UTMT ने अगले ५ साल में ३०००० किसानो तक पहुचकर इसका उपक्रम का लाभ दिलाने का निश्चय किया है।

UTMT honey

UTMT की इलाइची , लीची तथा संतरा शहद

UTMT के ३० कर्मचारी के अथक परिश्रम से आज उच्च प्रति का शहद बाज़ार में उपलब्ध है जिसमे केरला से इलायची शहद, बिहार से लीची शहद और नागपुर से संतरा (ऑरेंज) शहद है।

UTMT के काम और सभी उत्पादन के बारे में जानने के लिये आप उनके वेबसाइट पर चेक कर सकते है या श्रीमती कृष्णमूर्ति को उनके ई-मेल [email protected] पर  लिख सकते है।


 

मूल लेख – श्रेया पारीक द्वारा लिखित।

 

 

 

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