प्रेमचन्द उन साहित्यकारों में रहे हैं जिनकी लेखनी और जीवन में कोई अंतर नहीं रहा। उन्होंने गांधी जी के कहने पर नौकरी छोड़ दी थी। वे कहते रहे कि मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। मैं साहित्य और स्वराज के लिए कुछ करते रहना चाहता हूँ।

प्रेमचन्द जी के जन्मदिवस पर दो पत्र यहां पढ़ सकते हैं जो उन्होंने बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखे थे, उनमें उनका व्यक्तित्व साफ़ झलकता है।

पहला पत्र उन्होंने 3 जुलाई 1930 में लिखा:-

“मेरी आकांक्षाएं कुछ नहीं है। इस समय तो सबसे बड़ी आकांक्षा यही है कि हम स्वराज्य संग्राम में विजयी हों। धन या यश की लालसा मुझे नहीं रही। खानेभर को मिल ही जाता है। मोटर और बंगले की मुझे अभिलाषा नहीं। हाँ, यह जरूर चाहता हूँ कि दो चार उच्चकोटि की पुस्तकें लिखूं, पर उनका उद्देश्य भी स्वराज्य-विजय ही है। मुझे अपने दोनों लड़कों के विषय में कोई बड़ी लालसा नहीं है। यही चाहता हूं कि वह ईमानदार, सच्चे और पक्के इरादे के हों। विलासी, धनी, खुशामदी सन्तान से मुझे घृणा है। मैं शान्ति से बैठना भी नहीं चाहता। साहित्य और स्वदेश के लिए कुछ-न-कुछ करते रहना चाहता हूँ। हाँ, रोटी-दाल और तोला भर घी और मामूली कपड़े सुलभ होते रहें।”

दूसरा पत्र उन्होंने 1 दिसम्बर 1935 में लिखा:-

“जो व्यक्ति धन-सम्पदा में विभोर और मगन हो, उसके महान् पुरुष होने की मै कल्पना भी नहीं कर सकता। जैसे ही मैं किसी आदमी को धनी पाता हूँ, वैसे ही मुझपर उसकी कला और बुद्धिमत्ता की बातों का प्रभाव काफूर हो जाता है। मुझे जान पड़ता है कि इस शख्स ने मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को – उस सामाजिक व्यवस्था को, जो अमीरों द्वारा गरीबों के दोहन पर अवलम्बित है-स्वीकार कर लिया है। इस प्रकार किसी भी बड़े आदमी का नाम, जो लक्ष्मी का कृपापात्र भी हो, मुझे आकर्षित नहीं करता। बहुत मुमकिन है कि मेरे मन के इन भावों का कारण जीवन में मेरी निजी असफलता ही हो। बैंक में अपने नाम में मोटी रकम जमा देखकर शायद मैं भी वैसा ही होता, जैसे दूसरे हैं -मैं भी प्रलोभन का सामना न कर सकता, लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि स्वभाव और किस्मत ने मेरी मदद की है और मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। इससे मुझे आध्यात्मिक सान्त्वना मिलती है।”

मुंशी प्रेम चंद की कविताएं

प्रेमचंद कवितायेँ नहीं लिखते थे, लेकिन उन्होंने अपनी कहानियों में कई बार कविताएँ शामिल की हैं।

यहाँ कुछ उन कविताओं या काव्यांशों को प्रकाशित कर रहे हैं, जिन्हे कथा सम्राट प्रेम चंद की कहानियों में जगह मिली है। यह किसकी रचनाएं हैं यह जानने से कहीं महत्वपूर्ण है कि ये प्रेम चंद की पसंदीदा कविताएं हैं, पसंदीदा मैं इसीलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि ये कविताएं आज यहाँ जीवन पा रही हैं, कविताएं ऐसे भी जिंदा रहती हैं । यह सिलसिला चलता रहेगा, आज पढ़िये प्रेम चंद की पसंद में दो कविताएं।

पहली कविता

क्या तुम समझते हो ?

क्या तुम समझते हो मुझे छोड़कर भाग जाओगे ?

भाग सकोगे ?

मैं तुम्हारे गले में हाथ डाल दूँगी,

मैं तुम्हारी कमर में कर-पाश कस लूँगी,

मैं तुम्हारा पाँव पकड़ कर रोक लूँगी,

तब उस पर सिर रख दूँगी,

क्या तुम समझते हो,

मुझे छोड़ कर भाग जाओगे ?

छोड़ सकोगे ?

मैं तुम्हारे अधरों पर अपने कपोल
चिपका दूँगी,
उस प्याले में जो मादक सुधा है-
उसे पीकर तुम मस्त हो जाओगे।
और मेरे पैरों पर सिर रख दोगे।

क्या तुम समझते हो मुझे छोड़ कर भाग जाओगे ?

( यह कविता रसिक संपादक कहानी से है और वहाँ इसकी रचनाकार कामाक्षी हैं )

दूसरी कविता

माया है संसार

माया है संसार सँवलिया, माया है संसार
धर्माधर्म सभी कुछ मिथ्या, यही ज्ञान व्यवहार,
सँवलिया माया है संसार।
गाँजे, भंग को वर्जित करते, है उन पर धिक्कार,
सँवलिया माया है संसार।

( यह पद गुरु मंत्र कहानी से)

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