नागपुर की भक्ति घटोळे की नौ साल की उम्र में ही कैंसर ने दृष्टि छीन लीं, लेकिन फिर भी उनके सपने और जुनून ने उन्हें रुकने नहीं दिया और आज भक्ति सफलता के स्तम्भ स्थापित करते हुए अपने आइएएस बनने के सपने की ओर बढ़ रही हैं।

नागपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में घटोळे परिवार के लिए गर्व के पल हैं क्योंकि उनके परिवार की सबसे छोटी बेटी को स्नातक के प्रथम वर्ष में गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया है। भक्ति राजनीती विज्ञान से स्नातक की पढाई कर रही हैं। भक्ति नेत्रहीन हैं पर पूरे आत्मविश्वास से मंच पर सम्मान ग्रहण करने पहुँचती हैं।

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जन्म से दुनियां न देख पाने से ज्यादा मुश्किल होता है, देखते-देखते एक दिन अचानक कुछ न देख पाना। जिसने जन्म से ही दुनियां नहीं देखी वो अपनी अलग दुनियां रच लेते हैं, पर जिसने दुनियां के सारे रंग देखे हों फिर उसे सिर्फ अँधेरे के रंग से सबकुछ रचना हो तो बात अलग होती है।

नागपुर की भक्ति घटोळे के साथ ऐसा ही हुआ। लेकिन उन्होंने न सिर्फ़ सपने देखे बल्कि उनको पूरा करने कि दिशा में आगे बढ़ रही हैं। २१ साल की भक्ति के लिए ये सफर बहुत लंबा रहा है और आने वाला सफर भी उन्होंने लम्बा चुना है। भक्ति आई ए एस बनने के अपने सपने की ओर बढ़ रही हैं।

“ये सब कभी भी इतना आसान नहीं रहा, पर मुझे कभी अधूरापन नहीं महसूस हुआ। हाँ मेरा दिव्यांग होना कई बार बाधा बनता है, लेकिन ये कभी मुझे अपने सपने पूरे करने से नहीं रोक सकता। जिंदगी खूबसूरत है और मैं इसे पूरी तरह जीना चाहती हूँ।” भक्ति उत्साहित होकर कहती हैं।

जब वो नौ साल की थीं तो खतरनाक नेत्र-कैंसर से उनकी आँखों की रौशनी चली गई। सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची के लिए रंग बिरंगी दुनियां में पूरी तरह से अँधेरा छा गया।

छः महीने की उम्र में डॉक्टरों ने भक्ति की दायीं आँख में कैंसर होने की पुष्टि की थी। तमाम कोशिशों के बाबजूद डॉक्टर्स उनकी दायीं आँख को नहीं बचा पाए, लेकिन उन्होंने सुनिश्चित किया कि खतरनाक कैंसर दूसरी आँख तक न पहुँच पाए। पर दुर्भाग्य से कैंसर दूसरी आँख तक भी पहुँच गया।

जब भक्ति सात साल की हुईं तो कैंसर ने उनकी दूसरी आँख पर भी आक्रमण कर दिया। उनकी छोटी सी दुनियां में उथल-पुथल मच गयी। राष्ट्रीय बीमा कंपनी में विकास अधिकारी पिता रमेश घटोळे और माँ सुषमा अपनी दोनों बेटियों को लेकर गाँव से नागपुर शहर में बस गए ताकि भक्ति के उपचार में कोई चूक न हो। नागपुर से परिवार को चेन्नई और हैदराबाद जाने की जब भी जरूरत पड़ी, उन्होंने कोई मौका नहीं छोड़ा। एक लंबे इलाज के दौरान लगभग 25 कीमोथेरेपी कराने के बाबजूद भक्ति को अपनी बाईंं आँख भी खोनी पड़ी।

“मैं तब सात साल की थी और बहुत कुछ देख चुकी थी। इसलिए जब मेरी बायीं आँख भी चली गई तब मैं बुरी तरह हार गयी। मैंने सबसे बात करना बंद कर दिया। मैंने डॉक्टरों के पास और मन्दिरों में जाना बंद कर दिया। मैं बस सबकुछ छोड़ना चाहती थी। इसी समय मेरा परिवार मुझे नागपुर में योग अभ्यास मंडल में ले गया। मैंने योग और ध्यान का अभ्यास शुरू किया और इससे मुझे फायदा होने लगा। धीरे-धीरे मेरे व्यक्तित्व में सकारात्मकता आने लगी और मैंने अपनी ज़िन्दगी को ज्यों का त्यों स्वीकारना शुरू कर दिया,” भक्ति याद करते हुए बताती हैं।

स्कूल के शुरुआती वर्ष उलझन भरे रहे। भक्ति अपने उपचार की वजह से निरन्तर स्कूल नहीं जा पाईं, पर अपनी बड़ी बहन की सहायता से उन्होंने ब्रेल लिपि सीखनी शुरू की। भक्ति की ज़िन्दगी में टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्हें अपनी टीचर जिन्यासा कुबड़े मिलीं। जिन्यासा कुबड़े खुद भी नेत्रहीन हैं और नेत्रहीन स्टूडेंट्स को अपनीं सस्था आत्मदीप के माध्यम से कम्प्यूटर की ट्रेनिंग देती हैं।

“मैंने ब्रेल सीख ली थी पर सच्चाई ये थी कि मैं इसे इतना पसंद नहीं करती थी। जब मैंने कम्प्यूटर प्रयोग करना सीखा तो मेरी पूरी दुनियां बदल गई। चीजें मेरे लिए आसान हो गई। कम्प्यूटर मेरे लिए अलादीन का चिराग बन गया। अब मैं अपने ज्यादातर काम बिना किसी की मदद के खुद ही कर लेती हूँ। मैं अपना ई-मेल लिख सकती हूँ, सोशल मीडिया अकाउंट चलाती हूँ और इंटरनेट प्रयोग करती हूँ। और अब तो मैं अपने एग्जाम भी कम्प्यूटर के जरिये लिखती हूँ। आखिरी बार दसवीं कक्षा में मुझे एग्जाम लिखने के लिए सहायक की जरूरत पड़ी थी,”भक्ति उत्साहित होकर बताती हैं।

भक्ति ने एसएससी के दसवीं बोर्ड परीक्षा में 94 फीसदी अंक प्राप्त किए और दिव्यांगों की श्रेणी में राज्य में टॉपर रहीं।

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यही सिलसिला जारी रखते हुए भक्ति 12 वीं में नागपुर जिले में 88 फीसदी अंकों के साथ दूसरी टॉपर रहीं। उनकी सफलता का सिलसिला कॉलेज में भी बना रहा। अपने इस शानदार सफर का श्रेय भक्ति अपने परिवार को देती हैं।

“मेरे माता-पिता, मेरी बहन और हमारे बड़े परिवार के सारे सदस्य हमेशा मेरे साथ खड़े रहे। मैं संयुक्त परिवार का हिस्सा हूँ और ये मेरे लिए एक बड़े सपोर्ट सिस्टम के रूप में हमेशा खड़ा रहा। वे निरन्तर मुझे बेहतर इंसान बनाने में लगे रहे,” भक्ति कहती हैं।

भक्ति के इस सफर में सहयोगी रही संस्था आत्मदीप सोसाइटी के साथ आप यहां जुड़ सकते हैं।

मूल लेख :- अदिति पटवर्धन


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