“कुछ साल पहले हरियाणा के बहादुरगढ़ स्लम स्कूल में मैंने मेडिकल कैम्प लगाया था। मैं ये देखकर हैरान रह गई कि वहां हर बच्चा कुपोषण का शिकार है। मेरी साथी डॉक्टर ने बताया कि कम से कम 80 फीसदी ऐसे बच्चे हैं जो अत्यधिक कुपोषण के शिकार हैं। ये मेरी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट था जहां मैंने महसूस किया कि मुझे इन बच्चों को इस समस्या से उबारने के लिए कोई न कोई रास्ता खोजना होगा।”
ये कहानी है कनिका आहूजा की, जिन्होंने कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर इस घटना से प्रभावित होकर अपनी ज़िन्दगी का मकसद बदल लिया और हरियाणा के बहादुरगढ़ के बच्चों के हालात बदलने में जुट गयीं। कनिका इस कम्युनिटी में आधे दशक से रह रही हैं, इस दौरान उन्हें एहसास हुआ कि इस समस्या की जड़ खेती में है।

कनिका ने क्लेवर बड की स्थापना की है, जो खेती करने के ऐसे तरीके पर काम करती है, जिससे न सिर्फ फसलों की गुणवत्ता अच्छी होती है, बल्कि फसलें कहीं भी कभी भी आसानी से उगाई जा सकती हैं और वो भी बिना कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग के। इतना ही नहीं फसलें बिना मिट्टी के भी उगाई जा सकती हैं।

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कनिका के माता-पिता ने एक कचरा प्रबंधन और पुनर्चक्रण संस्था की स्थापना की है, इसलिए कनिका के लिए संस्टेनिबिलिटी की समस्या नहीं रही। कनिका ने अपने करियर की शुरुआत मार्केट रिसर्च से की लेकिन बाद में सामाजिक सरोकारों में उन्हें अपना भविष्य नज़र आने लगा। उन्होंने अपने माता-पिता की संस्था ज्वाइन की और काम करते करते अपनी संस्था शुरू कर दी।

बहादुरगढ़ के स्लम एरिया के बच्चों में कुपोषण का व्यापक स्तर देखकर कनिका को अपना मकसद मिल गया और उन्होंने ऐसी पहल शुरू की, जिससे सबको फायदा होने वाला था।

“मेरे जीवन में भोजन, स्वास्थ्य और सामाजिक अच्छाई महत्त्वपूर्ण चीजें रहीं हैं। आज कुपोषण ही सिर्फ वंचित वर्गों की समस्या नहीं है, हालांकि ये सबसे खतरनाक जरूर है, जिसका दंश समाज के अन्य तबके भी झेल रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या है खेती में कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से होने वाली कैंसर, अस्थमा, मस्तिष्क के रोग और कई खतरनाक बीमारियां हैं, जो पोषण भोजन की कमी से होती हैं,” कनिका कहती हैं।

क्लेवर बड की पद्धति पॉली हॉउस खेती और हाइड्रोपोनिक के साधारणीकरण पर आधारित है जो सब्जियों की वृद्धि कोे अनुकूल बनाती है।

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सब्जियों के बीज बिना मिट्टी के बोये जाते हैं और उनके लिए जरुरी पोषक तत्व बाहर से प्रदान किए जाते हैं।

“इसका उद्देश्य किसानों को खुद ही ऐसे खेती करने की पद्धति प्रदान करना है जिससे वे खुद हरी और पोषकयुक्त खेती कर सकें जो कीटनाशकों से एकदम मुक्त है,” कनिका बताती हैं।

इस पद्धति से किसान अपनी फसलें परंपरागत खेती से 3 से 5 गुना कम समय में उगा सकते हैं। फसलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।

“मैं व्यक्तिगत रूप से हाइड्रोपोनिक तकनीक से प्रभावित हूँ, क्योंकि इसमें देश में खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने की क्षमता है।”

हमारी ब्रांड दो तरह के प्रोडक्ट बनाती है। पहला सीबी सॉइल सिस्टम, जो उर्वरक क्षेत्र के लिए है और पॉलीहाउस खेती के लिए भीतरी क्षेत्र में भी सालभर फायदेमंद मौसम तैयार करता है। और दूसरा शुष्क क्षेत्रों के लिए सीबी साइल लैस सिस्टम की सलाह देती है, इस पद्धति में बिना मिट्टी के कोकोपीट की सहायता से फसलें उगाई जा सकती हैं।

खेती करने का ये तरीका फसलों के लिए जरुरी कीटनाशकों की खपत को ख़त्म कर देता है और काम क्षेत्र में ज्यादा फसल उगाने का फायदा भी मिलता है।

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क्लेवर बड की टीम सिंचाई के साधन, सोलर पैनल और पम्प के साथ साथ तापमान नियंत्रण करने के तरीके भी लोगों को मुहैया कराती है, जिससे खेती करने में सहूलियत हो।

कनिका इस सिस्टम के सरलीकरण के बारे में बताते हुए कहती हैं, “ये प्रयोग करने में आसान है, सबके लिए जिसे खेती का ज्ञान हो या कम जानकारी हो। आसान से तरीकों से बच्चे तक इस सिस्टम को मैनेज कर सकते हैं।”

क्लेवर बड अभी हरियाणा में पाइलट प्रोजेक्ट चलाने के साथ साथ उत्तर प्रदेश में नया प्रोजेक्ट शुरू कर रही है।

शुरुआती तीन पाइलट प्रोजेक्ट बहादुरगढ़ में दो साल पहले सेट अप किए गए और तकनीकी को जांचने और बेहतर करने की सम्भावनाओं को खोजा गया। कनिका इस समुदाय के स्लम एरिया में लोगों के बीच तकरीबन पिछले 5 सालों से रह रही हैं, जिससे उन्हें इस प्रोजेक्ट को सेट अप करने में मदद मिली।

“हमारा पाइलट सिस्टम इस क्षेत्र के स्लम में रहने वाली महिलाएं चलाती हैं, जिन्होंने इस सिस्टम को बेहतर किया है और इसमें कई तरह की सब्जियां उगाना सीखा है, चाहे वो पत्तेदार सब्जियों की बात हो या बैंगन भिन्डी जैसी सब्जियों की। इन महिलाओं ने इसमें हर तरह की मिर्चों से लेकर तमाम सब्जियां उगाई हैं। ये सब उत्पादन इनका अपना है, इसमें से कुछ स्लम एरिया में इनके घरों में जाता हैं और कुछ बाजार में बिक्री के लिए। इन महिलाओं ने काम करते हुए हमें कई सुधार बताए हैं जिनपर हम अपने नए सिस्टम में काम कर रहे हैं। इस तरह हम सेल्फ सस्टेनेबल मॉडल बनाने में कामयाब रहे हैं, जहां एक आम महिला अपना व्यवसाय शुरू कर सकती है और साथ ही अपने बच्चों को पोषक भोजन खिला सकती है।” कनिका उत्साहित होकर बताती हैं।

क्लेवर बड सिस्टम में कम्युनिटी का सहयोग सराहनीय रहा है।

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क्लेवर बड टीम अभी दिल्ली लोक निर्माण विभाग से बातचीत कर रहे हैं ताकि लोकल लोगों को विभिन्न सस्टेनेबल बिजिनेस मॉडल में शामिल कर प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे जरूरत के वक़्त इसमें काम कर सकें।

इसके साथ ही इस टीम ने इस कम्युनिटी के लिए एक कम खर्चे का विद्यालय भी शुरू किया है। स्कूली बच्चों का एक समूह चलाता है और उनके लिए मिड डे मील का इंतज़ाम किसान अपनी सब्जियों और अन्य फसलों से करते हैं।

“हालिया लक्ष्य कॉर्पोरेट कंपनियों को प्रोजेक्ट में शामिल करना है ताकि उनके सी एस आर खर्चे से स्कूल की शिक्षा और पोषक खाने का इंतज़ाम हो सके। आखिरकार आज के बच्चे ही कल के नेता हैं,” कनिका कहती हैं, जिनका लक्ष्य इस वर्ष कम से कम 10 ऐसे ही कम खर्चे वाले स्कूल खोलने को आशान्वित हैं।

दिल्ली की निवासी कनिका एक और अभियान में जुटी हैं, जिसमें दिल्ली की हर खाली छत पर वे सीबी सिस्टम देखना चाहती हैं। उनकी टीम ऐसी छत की डिजाइन में जुटी है जिसमें छत पर गार्डन के साथ सोलर सिस्टम भी लगाया जा सके।

अगर आप कनिका के अभियान से जुड़ना चाहते हैं तो उनके क्लेवर बड के फेसबुक पेज पर जा सकते हैं।

मूल लेख – सोहिनी डे 


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