मारे देश की आर्थिक राजधानी कहा जाने वाला मुंबई शहर में जहां एक बड़े भू-भाग पर इंसानी आबादी बसी हुई है वहीं, यहाँ शहरवासियों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुछ छोटे मगर बेहद ज़रूरी पार्क भी है। सीओन का ‘महाराष्ट्र नेचर पार्क’ जो की माहिम नेचर पार्क के नाम से जाना जाता है, ऐसे ही कुछ पार्क में से एक है।

हालांकि, बहुत कम लोगों को यह पता है कि यह पार्क जो आज 18,000 पेड़ों का घना जंगल है और कई प्रकार के वन्य जीवो का घर है, कभी शहर के कचरा डालने का स्थान हुआ करता था जहां हर रोज़ शहर से सैकड़ों टन कचरा लाकर डाला जाता था। चहल-पहल भरे बांद्रा-सीओन लिंक रोड पर स्थित यह डम्पिंग यार्ड प्रशासन द्वारा वर्ष 1977 में बंद कर दिया गया था।

तब करीबन 40 साल पहले मुंबई के तीन निवासियों ने जो ‘वर्ल्ड वाइल्डलाइफ इंडिया’ (WWF इंडिया) के लिए काम करते थे, उन्होंने आगे आकर इसे इस शहर के लिए प्राणवायु प्रदान करने वाले पार्क के रूप में बदलने का निश्चय किया।

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माहिम नेचर पार्क

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जाने माने ओर्निथोलोजिस्ट (पक्षी विज्ञानी) व प्रकृतिवादी स्वर्गीय श्री सलीम अली के दृष्टिकोण से प्रभावित होकर कॉर्पोरेट वकील और WWF की चेयरमैन (महाराष्ट्र व गोवा), शांता चटर्जी ने शिक्षा अधिकारी हिमांशु जोशी के साथ मिल कर एक ऐसे पार्क के रूप में जो प्रकृति के करीब तो ले जाए ही साथ ही प्रकृति संबंधी शिक्षा भी प्रदान करे, की नींव रखी व वास्तुकार उल्हास राणे ने इसका ख़ाका तैयार किया।

“हमने सबसे पहले इस विचार पर काम किया कि यह पार्क पूरे भारत में अपनी तरह का अनोखा पार्क होना चाहिए, जहां पूरे भारत में पाये जाने वाले अलग अलग तरह के पेड़ लगे हों। वहीं से हम इस विचार पर काम करने लगे कि प्रकृति को जरा सा भी नुकसान मानव जाति के अस्तित्व को खतरे में डाल सकता है,” चटर्जी कहती हैं।

1977 में WWF ने मुंबई महानगरीय क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण को पार्क का प्रस्ताव भेजा। जब यह पार्क स्वीकृत हो गया तो इन तीनों ने 1980 के दशक में यूएस नेशनल पार्क सर्विस टीम से अपने इस आइडिया को क्रियान्वित करने में मदद मांगी। टीम के दो मुख्य उद्देश्य थे- पहला- एक शैक्षिक थीम पार्क बनाना व दूसरा- सदाबहार वन का विकास।

पहला पेड़ 1983 में सलीम,अली द्वारा लगाया गया (टीम ने ऐसे पेड़ चुने जो हर मौसम में पक्षियों को आकर्षित कर सके), उसके बाद समूह ने इस कचरा यार्ड को पार्क में परिवर्तित करने का कार्य शुरू किया। यह सुखद कार्य नहीं था; टनों कचरे के ढेर को हटाना व मिट्टी को फैलाना ताकि पेड़ लगाए जा सके।

सुखद बात यह है कि इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के कृत्रिम उर्वरकों व रसायनों का उपयोग नहीं किया गया बल्कि इस पार्क में केंचुआ खाद व वर्षा जल भंडारण की व्यवस्था की गयी।

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माहिम नेचर पार्क तितलियों की कई प्रजातियों का घर है।

साथ ही उसी समय मीठी नदी, व माहिम की खाड़ी को प्रदूषण मुक्त करने का अभियान चलाया गया जिसके किनारे पर यह कचरा यार्ड स्थित था। अगले कदम के रूप में 1,50,000 मेंग्रोव पौधे माहिम पार्क के आस-पास खाड़ी में लगाए गए, आज यह बेहतरीन मेंग्रोव जंगल है।

कई सालों के अथक परिश्रम के बाद 1992 में यह पार्क बच्चों के लिए खोला गया। आनंद पांडेकर जो कि मुंबई के एक पर्यावरणविद है ने इस समूह के इस पार्क को विकसित करने के प्रयासों को देखा था कहते है कि यह कार्य बहुत मुश्किल थे क्योंकि उस समय सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे।

“हो रहे दंगो के बावजूद, सलीम अली का ऐसे स्थान की स्थापना जहां बच्चे प्रकृति से संवाद कर सके उस दृष्टिकोण को फलित किया गया। एक कचरा डालने वाले डम्पिंग यार्ड से एक घने जंगल तक का यह बदलाव एक अत्यंत कठिन कार्य था, क्योंकि यह स्थान गंदगी से पूरी तरह से भरा हुआ था,” पांडेकर बताते हैं।

1994 में महाराष्ट्र नेचर पार्क सोसाइटी ने इस पार्क का अधिग्रहण कर लिया व यह पार्क आम लोगों के लिए खोल दिया गया।

पर्यावरणविद महास्कर जो इस पार्क की अवधारणा के समय से ही टीम के साथ है, उनका मानना है कि यह पार्क स्कूली बच्चों के लिए वरदान साबित हुआ है “शुरुआत में यह पार्क सिर्फ बच्चों के लिए खोला गया था पर जब हमें लगा कि हमें अन्य सुविधाओं जैसे रंगमंच व पुस्तकालय को स्थापित करने के लिए फण्ड  की आवश्यकता है तो हमने यह पार्क बड़ो के लिए भी खोलने का निश्चय किया, पार्क में उगाये आयुर्वेदिक पौधो की बिक्री से होने वाली आय भी हमारे फण्ड  के स्रोत में शामिल हुई।”

जमीन के भीतर जमा कचरा पेड़ो को पानी व पोषण नहीं मिलने देता इसलिए प्रबंधन को हमेशा सूखे पेड़ो की जगह नए पेड़ लगाने पड़ते है। साथ ही पेड़ो की मदद के लिए प्रबंधन सर्दियों में पेड़ो के पास खोदे गए गड्डो में पानी भरता है। पेड़ो की जड़े अपने पास भरे पानी का पता लगाकर धीरे-धीरे कुछ महीनों में उस तरफ बढ़ जाती है जो उन्हे  मुंबई की झुलसा देने वाली गरमी में मददगार होतीं है।

टीम यह भी निश्चित करती है कि लगाए जाने वाले पेड़ भारतीय मूल के ही हों, ऐसी प्रजातिया जिन्हें अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती हैं से परहेज किया जाता है। साथ ही, पार्क में एक हिस्सा बागवानी और औषधीय पौधे लगाए गए है। इतनी विशाल वनस्पति को सिंचाई की आवश्यकता पूर्ति के लिए पार्क में वर्षा जल भंडारण की व्यवस्था की गयी है जो कि तकरीबन 2,000 किलो लीटर पानी हर साल मानसून के समय एकत्रित करता है। वर्षा जल एक खुले तालाब में एकत्रित किया जाता है जो पार्क के जलीय पौधों व पार्क के रैन एडुकेशन सेंटर के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

तीन दशक में यह पार्क कीचड़ में खिले कमल की तरह, एक घने जंगल में तब्दील हो गया है जो की धारावी की गंदगी से बढ़ा है। (धारावी एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती है जो पार्क के किनारो पर स्थित है)

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माहिम नेचर पार्क मे बना एक रास्ता

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सालों के इस बदलाव के साथ अब यह पार्क प्रकृति प्रेमियों व पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों को देखने वालों की पसंदीदा जगह बन गयी है। हर साल इस पार्क में 1,50,000 लोग आते हैं जो घर है 14,000 वनस्पति, 120 प्रकार के पक्षी, 75 प्रकार की तितलियाँ, 30 से ज्यादा प्रकार की मकड़ियाँ व कई प्रकार की सरीसृप प्रजातियों का।

कई प्रकार की वनस्पतियों से घिरे होने के कारण यह पार्क बाहर की भीड़-भाड़ भरी सड़कों के शोरगुल से शांत और कम तापमान का एहसास देता हैं। खाड़ी के नजदीक एक जगह निर्धारित की गयी है जहां पक्षी प्रेमी बैठकर पार्क की जैव विविधता का मज़ा ले सकते हैं। पार्क के ‘शांति पथ’ पर भी लोग शुद्ध हवा का मज़ा लेते हुए इत्मीनान से चहलकदमी कर सकते हैं।

पार्क के बीचों-बीच एक बिल्डिंग है जो वहाँ का पुस्तकालय, रंगमंच व आडिओ- विजूअल रूम की सुविधा उपलब्ध कराता है। 

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प्रकृति प्रेमियो, पिकनिक मनाने वालों व फोटोग्राफी के शौकीन लोगों के बीच पसंद किया जाने वाला यह पार्क नेचर ट्रेल्स (बॉम्बे नेचुरल्स हिस्ट्री सोसाइटी द्वारा आयोजित) व संडे को किसान बाज़ार भी आयोजित करता है।

कचरे के ढेर से जंगल बना माहिम नेचर पार्क मुंबई के कोंक्रीट के जंगल के बीच एक हरित प्रवेश द्वार ही नहीं है बल्कि यह उस पर्यावरण शिक्षा का केंद्र भी है जिसकी आज हमे बहुत जरूरत है।  

कहाँ: बांद्रा-सीओन लिंक रोड, धारावी बस डिपो के पास

कैसे पहुंचे: सीओन से कुछ ही दूरी पर (सेंट्रल रेल्वे स्टेशन)। धारावी बस डिपो लैंडमार्क है। वेस्टर्न लाइन से बांद्रा (पूर्व) स्टेशन पर उतरिए यहाँ से ईस्टर्न स्काइवाक लीजिये व इसके आखरी निकास द्वार तक चलते जाइए, काला नगर जंक्शन तक। यहाँ से पार्क के लिए ऑटो ले सकते हैं।

पार्क टाइमिंग्स: सप्ताह के आम दिनो में सुबह 9:30 से 6 बजे तक, सप्ताहांत व छुट्टी के दिन जाने के लिए पहले सूचित करना जरूरी।

मूल लेख: संचारी पाल


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