देश में साक्षरता बढ़ाने के तमाम प्रयासों के बाबजूद साक्षरता दर वैश्विक औसत की तुलना में लगातार गिर रही है। रेणु शर्मा ने इस समस्या के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करते हुए देश की साक्षरता दर में बढ़ोतरी के सुझाव दिए हैं, जिससे हम अपनी साक्षरता दर वैश्विक राज्यों की साक्षरता के स्तर पर पहुंचा सकें।

निरक्षरता किसी भी राष्ट्र के विकास में एक बड़ी बाधा है। इसके परिणाम बेरोजगारी, जनसँख्या वृद्धि और गरीबी जैसी खतरनाक समस्याएं उत्पन्न करते हैं। ये ऐसी समस्या है जिसे आज़ादी के बाद से सुलझाने में देश जुटा है। सरकार और गैर सरकारी संघठनों के प्रयासों से निरक्षरता की दर गिरी है, और साक्षरता के आंकड़े बढ़े हैं लेकिन ये वैश्विक देशों के औसत आंकड़ों के लिए पर्याप्त नहीं है। अभी भी ऐसे बहुत से उपाय हैं जिन्हें अपनाकर हम निरक्षरता से मुक्ति पा सकते हैं।

आपको लग सकता है कि ये आपकी समस्या नहीं है, लेकिन बड़े परिदृश्य में सच्चाई यही है कि ज्यादा निरक्षरता किसी भी देश को तरक्की से पीछे धकेलती है। इससे हम सब इस तरह प्रभावित हैं, कि आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते। हम सबको एक साथ आगे आना होगा और शिक्षा से वंचित बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे, क्योंकि यही बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं।

भारत की निरक्षरता के कई कारण हैं इसलिए साक्षरता के लिए कोई एक समाधान काम नहीं आ सकता। लेकिन कुछ छोटे छोटे समाधान हैं जो उच्च साक्षरता हासिल कराने में सहायक होंगे।

मुफ़्त शिक्षा

भारतीय संसद ने 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ पास किया, जिसके अनुसार 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को अनिवार्य मुफ़्त शिक्षा प्रदान को जाए। इस एक्ट के बाद देश के विद्यालयों में बच्चों की संख्या में इजाफ़ा हुआ और इस उम्र के दायरे में आने वाले बच्चे स्कूल में पढ़ने लगे।
लेकिन हमें उन बच्चों के बारे में भी सोचना होगा जो एक्ट में निर्धारित उम्र के दायरे में नहीं आते। 6 साल से छोटे बच्चों को अनिवार्य और मुफ़्त शिक्षा के दायरे में नहीं रखा गया है, ऐसे बच्चे बालश्रम की चपेट में आ सकते हैं। एक बार वे इस कारोबार में फंसे तो उनका निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है। यही कारन है कि देश में कई गैरसरकारी संस्थाएं इन बच्चों को शिक्षा से जोड़ने में काम कर रही हैं।

इसके साथ साथ 14 साल के बाद बच्चों को आगे पढाई जारी रखने में मदद के लिए ऐसी संस्थाएं आगे आएं और उन बच्चों को ऐसे कौशल सिखाने पर काम करें जिससे उन्हें रोजगार जल्दी मिल जाए।

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लचीली समय सारिणी

मुफ्त शिक्षा होने के बाबजूद भी बहुत से बच्चे स्कूल में नहीं जा पाते हैं। ऐसा कई बार इसलिए होता है कि जब दिन में स्कूल का वक़्त होता है तब वे घर वालों की मदद कर रहे होते हैं या मजबूरन घर चलाने के लिए काम कर रहे होते हैं। इसलिए दिन में सरकारी स्कूलों या गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा मिलने वाली मुफ्त शिक्षा से भी वंचित रह जाते हैं।

ऐसे में क्लास के समय को इस तरह बनाया जाए कि ऐसे बच्चे भी शामिल हो सकें। सुमीति मित्तल द्वारा संचालित संस्था ‘प्रथम शिक्षा’ इसी तरह की समय सारिणी पर काम करती है। जिससे बच्चों की पढाई पर अहम असर पड़ने की संभावनाएं रहती हैं।

इस तरह के क्लास समय सारिणी कमजोर बच्चों को मौका देती है कि वे दिन में अपना घर चलाने के लिए रोजी रोटी जुटा सकें और अपने खाली वक़्त में पढाई भी कर लें।

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रोजगारपरक प्रशिक्षण

शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है, हर व्यक्ति को जीवन यापन के लिए जरुरी कौशल और ज्ञान प्रदान करना जिससे वो अपने लिए रोजी रोटी कमा सके। इसके लिए प्राथमिक विद्यालय की शिक्षा प्रणाली वंचित बच्चों के लिए हमेशा कारगर नहीं हो सकती। एक बार वे काम करने की उम्र के पड़ाव पर पहुँच जाएँ तब उन्हें ऐसे कौशल की जरूरत होती है जिससे उन्हें रोजगार मिल जाए। यही वो वक़्त होता है जहाँ रोजगार परक प्रशिक्षण की जरूरत आ पडती है।

कुछ गैर सरकारी संस्थाओं में बच्चे रोजगार के लिए जरुरी प्रशिक्षण जैसे प्लंबिंग, इलेक्ट्रिशियन और सिलाई, कढाई, बुनाई सीखने के पाठ्यक्रमों में शामिल हो जाते हैं। ये पाठ्यक्रम कमजोर वर्ग के बच्चों को इस तरह के कौशल से लैस कर देते हैं, जिनसे उन्हें रोजगार ढूंढने में आसानी होती है।

‘प्रथम शिक्षा’ संस्था ने इस तरह के प्रशिक्षण देने में एक कदम और आगे बढ़ाते हुए एक निजी अस्पताल को सहयोगी बनाया है जहाँ ये बच्चे नर्सिंग की ट्रेनिंग सरकारी सर्टिफिकेट के साथ पूरी करते हैं।

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वंचित वर्ग में जागरूकता लाने से

सरकार और संस्थाओं के तमाम प्रयासों के बाबजूद आज भी ऐसे बहुत से परिवार हैं जो अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं, क्योंकि उनके दिमाग में शिक्षा की अलग छवि है। बहुत से परिवार ये मानते हैं कि शिक्षा का उन के लिए कोई उपयोग नहीं है। क्योंकि वे खुद बिना पढ़े-लिखे अपना जीवन जी रहे हैं तो बच्चों को कौन सी परेशानी आने वाली है; बच्चे भी जीवन यापन कर लेंगे।

ऐसे परिद्रश्य में हमें ज्यादा प्रयास करने की आवश्यकता है, जहाँ हम शिक्षा का महत्त्व उन्हें समझा सकें. ऐसा हम सार्वजनिक आयोजनों में भाषण देकर या बातचीत के ज़रिये कर सकते हैं। इस दौरान सिर्फ़ ये कहने की बजाय कि शिक्षा महत्त्वपूर्ण है, हम उन्हें शिक्षा की महत्ता दिखाएँ।

हम उन्हें ये समझाएं कि कैसे एक शिक्षित बच्चा अपने परिवार को आर्थिक फायदा तो पहुंचाता ही है साथ ही परिवार का सामाजिक स्टेटस बढा सकता है।

Source: By Harvinder Chandigarh (Own work) [CC BY-SA 4.0], via Wikimedia Commons

शिक्षकों को सशक्त बनाकर

बच्चो को अच्छी शिक्षा मिले, इसके लिए उनके पास बेहतर शिक्षित और समर्पित अध्यापक होना बहुत जरुरी है। निजी विद्यालयों और बेहतर सरकारी स्कूलों में अच्छे शिक्षकों की लंबी कतार हो सकती है। पर कमजोर और वंचित बच्चों के मामलों में बहुत मुश्किल से उन्हें ऐसे अध्यापक मिलते हैं, जो उन्हें समर्पण के साथ पढाने के इच्छुक हों। इसका अहम कारण है कि उन्हें या तो बहुत कम भुगतान होता है या कुछ भी नहीं मिलता।

इन शिक्षकों को भी हम दोष नहीं दे सकते क्योंकि उन्हें भी अपना घर चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है। इसलिए वे अपना पूरा वक़्त मुफ्त या कम वेतन में पढाने के लिए नहीं लगाते। ऐसे मामलों में गैर सरकारी संस्थाएं पढ़े-लिखे लोगों को स्वेच्छा से पार्ट-टाइम में पढाने का अवसर दे सकती हैं।

ऐसे शिक्षक अपनी नियमित नौकरी से कुछ घंटे निकालकर इन बच्चों को पढ़ा सकते हैं।

Source: Flickr

जब हम भारत में निरक्षरता को हटाने की बात करते हैं तो ऐसे बहुत से पहलू हमारे सामने खुलने लगते हैं।

ऊपर दिए गए पांच रास्ते वंचित और कमजोर बच्चों को शिक्षा के उजियारे तक पहुंचा सकते हैं!

इस लिंक पर जाकर आप भी प्रथम शिक्षा को अपना योगदान दे सकते है।

मूल लेख 


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