क छोटी से छोटी कोशिश भी दुनियां को बेहतर बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण पहल है। और हम सब मिलकर छोटी-छोटी कोशिश कर सकते हैं। आज की कहानी है ऐसी ही एक छोटी सी कोशिश की।

“अगर आप सैकड़ों लोगों का पेट नहों भर सकते तो केवल एक को भोजन दीजिए”

ये वाक्य उनके जीवन का ध्येय बन गया है, जिन्होंने ये पहल की। बेशक उनके पास कुछ बड़ा करने के स्रोत नहीं थे लेकिन उन्होंने जितना था उसमें से दुनियां को कुछ देने की कोशिश शुरू कर दी।

हम बात कर रहे हैं ऐसे शख्स की, जो अपने स्कूल केे ही एक  हिस्से में अनाथालय और वृद्धाश्रम चला रहे हैं।

रूपेश रँगराव पाटिल पेशे से सरकारी स्कूल में प्रधान अध्यापक हैं और मुम्बई के मलाड में स्थित प्राइमरी स्कूल में कार्यरत हैं। जब रूपेश अध्यापक थे तो उन्हें एक सरकारी काम के तहत स्कूल के बाहर बच्चों का सर्वेक्षण करने का जिम्मा मिला। उस सर्वेक्षण के दौरान उन्हें पता चला कि कितने बच्चे ऐसे हैं जिनके सिर के ऊपर छत नहीं है, खाने को पर्याप्त खाना नहीं है। ऐसे में वे कैसे स्कूल आ सकते हैं। तभी उनके मन में एक विचार आया कि इन बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए। रूपेश और उनकी पत्नी दोनों सरकारी अध्यापक हैं। इनके एक बेटा है। तब रूपेश ने एक सपना देखा कि मुझे एक नहीं सैकड़ों बच्चे पापा कहें।

उन्होंने सामाजिक सरोकारों के उद्देश्य से 2009 में अपनी संस्था,’श्री पराश ज्ञान शिक्षक प्रसारक’ मंडल की शुरुआत की। और एक निजी स्कूल, श्री नित्यानंद विद्यालय के परिसर में उन्होंने काम शुरू कर दिया।

पिछले वर्ष अगस्त में एक ऐसी घटना हुई, जिसके बाद रूपेश का अभियान शुरू हो गया। उनके स्कूल के बाहर एक नन्हीं सी जान को कोई छोड़कर चला गया, जब भीड़ जमा हुई और रूपेश को पता चला कि कोई 3 महीने की बच्ची को छोड़कर चला गया है, तो उन्होंने फौरन एफआईआर दर्ज कराकर उसे अपने पास रख लिया। उन्होंने उस बच्ची की परवरिश के लिए पास ही में रहने वाली एक महिला को रख लिया। उस बच्ची का नाम उन्होंने क्रांति रखा है। इस तरह क्रांति से उनके मिशन की शुरुआत हो गई।

रूपेश अपनी पहली कोशिश के बारे में भावुक होते हुए बताते हैं,

“मैंने उसे अपनी बेटी बनाया है, उसका नाम मैंने क्रांति इसलिए रखा है, क्योंकि मैं उसे ऐसा बनाना चाहता हूँ जो समाज के लिए मिसाल हो। ताकि कोई किसी भी बच्ची को उसकी तरह बाहर न छोड़े।”

आज संस्था के पास 10 वर्ष से कम उम्र के 9 बच्चे हैं। इन नौ बच्चों की भी अपनी-अपनी कहानी है। इनमें से ज्यादातर आदिवासी बच्चे हैं, किसी के माँ-बाप नहीं हैं, किसी के घर में खाना तक नहीं था तो किसी बच्चे का परिवार उसे पढ़ाने के काबिल नहीं था।

आज यहां बच्चे रहने-खाने के साथ-साथ पढ़ते हैं, खेलते हैं और कम्प्यूटर शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं। साथ ही इनके भविष्य के लिए संस्था की बेहतर योजनाएं हैं, जिसमें उच्च शिक्षा के साथ बेहतर जीवन यापन के लिए अच्छी नौकरी पाने के काबिल बनाने पर काम किया जा रहा है।
उन बच्चों के रहने और खाने की बेहतर व्यवस्था हो, ये सुनिश्चित करने के लिए रूपेश खुद स्कूल परिसर में ज्यादा वक़्त बितातेे हैं।

बच्चों के अनाथालय के साथ-साथ उन्हें एक बुजुर्ग महिला भी मिलीं जिनके पास पहनने को कपड़े तक नहीं थे। वो एक कबाड़ भरे कमरे में रहती थीं। रूपेश ने उनसे सम्पर्क किया तो उन्होंने किसी भी वृद्धाश्रम में रहने से मना कर दिया।

रूपेश बताते हैं कि हर दिन की मुलाकात के बाद वृध्द महिला उनके साथ आने को राजी हुईं।

“वो बहुत स्वाभिमानी महिला हैं, मैंने उन्हें भरोसे में लेने के लिए रोज मिलना और काफी देर तक बातचीत करना शुरू किया। फिर उन्हें भरोसा दिलाया कि उन्हें एक अच्छा सा किराए का कमरा दिलाया जायेगा जहां वे आराम से रह सकती हैं।”

अपने ज़माने में सिविल इंजिनियर रहीं ये महिला बताती हैं कि वे किसी वृद्धाश्रम में नहीं अपने घर में हैं। वे गाने की शौक़ीन हैं और मरने से पहले अपने गीतों की एलबम रिलीज करना चाहती हैं।

रूपेश बताते हैं कि एक महिला उन्हें अस्पताल से मिलीं, वे सड़क पर भीख मांगती थीं। एक दिन किसी ने टक्कर मार दी तो अस्पताल में भर्ती हो गईं। अस्पताल वालों ने रूपेश से सम्पर्क कर उन्हें सौंप दिया और उनकी देखभाल कर तंदुरुस्त कर दिया।

रूपेश अभी इस अनाथालय और वृध्दाश्रम को अपने परिवार के वेतन से चलाते हैं, लेकिन आने वाले समय में वे और सैकड़ों बच्चों को सहारा देना चाहते हैं। उनका सपना है कि वे आदिवासी बच्चों की उच्च शिक्षा और प्रशासनिक सेवा में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने में जी जान लगा दें।

हम सलाम करते हैं रूपेश पाटिल जी की इस छोटी सी खूबसूरत कोशिश को और आपसे आग्रह करते हैं कि अगर आप उन्हें किसी रूप में मदद करना चाहते हैं तो इस लिंक पर आप उन तक पहुँच सकते हैं।


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