मारे देश में खेती के लिए लम्बे समय तक बारिश न होने या अचानक बेमौसम होने वाली बारिश से फसलों की बर्बादी होती है जिसकी मार किसान को झेलनी पड़ती है। लेकिन इसका समाधान अहमदाबाद की एक सामाजिक संस्था ने अनोखी जल सरंक्षण प्रणाली खोजकर निकाला।

“सन् 2001 के भूकंप के दौरान में मैं गुजरात में ही था। वहां मैंने देखा कि भूकंप के कुछ ही महीनों बाद तापमान इतना बढ़ गया कि पानी की कमी हो गयी। इसके बाद मानसून आ गया और भारी बारिश से खेत लबालब भर गए। ये दोनों स्थितियां साल के अलग-अलग महीनों में एक ही क्षेत्र में पैदा हो रही थीं। यहां अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि दोनों स्थितियां एक-दूसरे का समाधान बन सकती हैं। जैसे भारी बारिश में खेतों में भरने वाला पानी, तापमान बढ़ने पर पैदा होने वाले सूखे के वक़्त प्रयोग किया जा सकता है, यदि उसे अंडरग्राउंड स्टोर किया जा सके,” किसानों को अनौखी तकनीक देने वाले बिप्लब केतन पॉल अपनी बात शुरू करते हुए बताते हैं।

बिप्लब ने इसी विचार को एक खोज बनाकर एक प्रणाली का अविष्कार किया- जिसे ‘भुंगरू’ का नाम दिया। ये जल सरंक्षण तकनीकी है जिससे बारिश का भारी जल खेतों में ही अंडरग्राउंड स्टोर कर लिया जाता है। जिसे किसान बाकी के महीनों में जरूरत के वक़्त खेतों की सिंचाई के लिए प्रयोग कर सकते हैं।

‘स्ट्रॉ’ को गुजराती में ‘भुंगरु’ कहते हैं। इस तकनीक को देश में गरीबी हटाने की मुहिम में जुटी सामाजिक संस्था नैरीता सर्विसेज ने तैयार किया है, जिसके निदेशक बिप्लब केतन पॉल हैं।

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गुजरात और देश के अन्य राज्यों में बंजर क्षेत्रों की स्थिति यह है कि वहां की मिट्टी की लवणता जमीन के ऊपर एक अभेद्य परत बना देती है, जिससे जमीन ज्यादा पानी सोख नहीं पाती। यही कारण है कि भारी बारिश के बाद भी पानी जमीन की ऊपरी परत पर ही टिका रहता है और मिट्टी के ऊपर नई लवणता परत बना देता है। ये लवणता मिटटी का खारापन है।

भुंगरु किसानों को इसी समस्या से निजात दिलाने की तकनीक है, जिसे मिट्टी की लवणता वाले क्षेत्रों में प्रयोग किया जा रहा है। इस प्रणाली में एक पाइप को जमीन के भीतर इस तरह फिट किया जाता है कि बाहरी जमीन का पानी इससे होता हुआ पहले फिल्टर होता है फिर जमीन के भीतर बने कुएं में जमा हो जाता है। बाद में किसान उस पानी को मोटर पम्प का प्रयोग कर बाहर निकालकर सिंचाई कर सकते हैं। इस तरह किसानों का दोगुना फायदा हो जाता है। ये तकनीकी मानसून के दौरान होने वाले पानी के नुकसान का भी बचाव करती है, वरना मानसून का पानी यूँ ही किन्हीं गड्ढों में भरे-भरे भाप बनकर उड़ जाता है।

जमीन के भीतर बने स्टोरेज में 40 मिलियन लीटर पानी भरा जा सकता है जिसे कम से कम 7 महीनों तक प्रयोग किया जा सकता है। इसके साथ-साथ बारिश का पानी जब मिट्टी के खारेपन वाले पानी के साथ मिलता है तो मिट्टी की लवणता को भी कम करता है और उसे खेती योग्य पानी बना देता है।

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‘भुंगरु’ तकनीक की 17 तरह की अलग अलग डिजाइने हैं, जिन्हें भारत के अलग अलग कृषि-क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है। हर खेत के लिए भुंगरु की अलग डिजाइन होती है। भुंगरु तकनीक को खेतों में फिट करने की शुरुआत नैरीता सर्विसेज ने की, अब उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक व्यव्सायी अशोका इंडिया से पार्टनरशिप में नॉलेज़-गाइडेंस मिल रहा है और विभिन्न गैर सरकारी संगठनों, सहकारी संगठनों, संस्थानों और विभिन्न संगठनों के सी. एस. आर. विभागों से पार्टनरशिप के तहत मिल रही मदद से नैरीता सर्विसेज तकनीकी को आम जीवन में बढ़ाने की भूमिका निभा रही है।

इस अभियान की एक और खासियत है कि भुंगरु प्रणाली को सेट-अप करने का काम ग्रामीण महिलाओं द्वारा किया जाता है। नैरीता सर्विसेज या अन्य सहयोगी संगठन इन स्वयं सेवी संगठनों की महिलाओं को प्रशिक्षण देते हैं।

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इन महिलाओं को भुंगरु समूह में शामिल करने के पहले चरण में, संस्था ने गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं को चुना और उनकी अपनी जमीन और गरीबी की स्थिति देखकर उन्हें प्रशिक्षण के लिए शामिल किया गया। एक भुंगरु समूह में पांच महिलाएं होती हैं, जिनमें से एक महिला अपनी जमीन पर भुंगरु का निर्माण करवाती हैं। ये टीम खेतों का भौगोलिक अध्ययन कर ऐसी जगह का पता लगाती है, जहां भुंगरु प्रणाली को स्थापित किया जाए।

भुंगरु के लिए खेत का सबसे निचला हिस्सा चुना जाता है, क्योंकि बारिश का पानी इसी हिस्से की ओर इकठ्ठा होता है। इसके बाद किसान भुंगरु के निर्माण के लिए मजदूर उपलब्ध करवाते हैं और सब मिलकर एक भुंगरु की सरंचना तैयार कर देते हैं।

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भुंगरु के निर्माण के दौरान 5 इंच के पाइप को जमीन में 110 फ़ीट की गहराई तक फिट करती है, जिसमें जल को छानने का फिल्टर भी लगा होता है। ये फिल्टर जमीन में जाने वाले पानी के साथ कूड़े, कंकड़ और मिटटी को जाने से रोकता है। एक बार जब पानी नीचे भर दिया जाता है तो जमीन के भीतर वाले पानी का गीलापन फसलों को बढ़ाने में मदद करती है। और इस तरह सालभर किसान के पास फसल की सिंचाई के लिए कभी भी पानी की कमी नहीं रहती।

तृप्ति जैन ने नैरीता सर्विसेज की स्थापना देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की कमजोर महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए की।

अपने सहयोगियों के साथ नैरीता देश में गुजरात, झारखण्ड, बुंदेलखंड, उत्तरप्रदेश, आंध्र प्रदेश और बिहार के खेतों में भुंगरु लगा चुकी है। नैरीता सर्विसेज में निदेशक बिप्लब अब तक 14,000 किसानों के साथ काम करते हुए उनकी 40,000 एकड़ जमीन को पानी से भरपूर कर आपदा से बचा चुके हैं।

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भुंगरु लगाने की कीमत के भुगतान के तौर पर किसानों को ‘राष्ट्रीय ग्रामीण जीवन यापन मिशन’ के तहत मिलने वाली सब्सिडी दी जाती है। कमजोर वर्ग से आने वाले किसान और सूखे से प्रभावित किसानों को एक भी पैसा नहीं देना पड़ता। पर समर्थ किसानों को सब्सिडी के साथ लगभग 5000 रुपये का भुगतान करना होता है। बाकी पैसा नैरीता सर्विसेज अपने पार्टनरशिप मॉडल के तहत सहयोगी संस्थाओं से लेती है।

46 साल के बिप्लब केतन पॉल ने अपने जीवन के 23 साल के लिए काम कर रहे है। अपनी उच्च शिक्षा के लिए बंगाल से गुजरात आए बिप्लब ने पढाई के बाद वहीं गाँवों में रहकर लोगों की सेवा करने का निर्णय लिया। 2001 में गुजरात में आए भूकंप के दौरान सहायता काम करते हुए उन्होंने महिलाओं का एक समूह बुलाया जिनके साथ मिलकर उन्होंने पानी के समाधान के लिए योजना बनाई। इसी वक़्त उन्हें एहसास हुआ कि महिलाएं प्रभावशाली सामाजिक परिवर्तन की डोर थाम सकती हैं। 2000 में उन्होंने ‘भुंगरु’ तकनीकी का निर्माण किया और 14 साल के प्रयोगों के बाद 2015 में यूनाइटेड नेशन्स क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में भुंगरु तकनीक को मूमेंटम ऑफ़ चेंज अवार्ड से सम्मानित किया गया।

बिप्लब कहते हैं,”महात्मा गांधी ने कहा था कि अंत्योदय का अर्थ पंक्ति में खड़े आखिरी व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ तरीके से लाभान्वित करना है। नैरीता सर्विसेज में हमारा उद्देश्य अंत्योदय को हर सम्भव प्रयास से लाभान्वित करना है। गाँवों में आखिरी व्यक्ति का मतलब सबसे कम जमीन वाला व्यक्ति है जिसके पास अपनी फसलों के लिए सिंचाई संसाधन की व्यवस्था नहीं है।”

बिप्लब अभी देश के शहरी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की तकनीकी पर काम कर रहे हैं।

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भुंगरु की कामयाबी पर बिप्लब गर्व से कहते हैं,”मैंने उन महिलाओं के साथ काम किया जो खेती किस स्थिति गिरने के कारण शहरों में काम की तलाश में प्रवास करती हैं। आज वे अपने घरों में रहकर अपनी जमीनों पर बेहतर भविष्य के लिए काम कर रही हैं।”

 

मूल लेख:- तान्या सिंह

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