1988 की बात है; 17 साल के अजीत सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी बी. ए की पढाई कर रहे थे, जब उन्हें उनके गाँव आजमगढ़, उत्तर प्रदेश से अपने चचेरे भाई की शादी में आने का न्योता मिला। अजीत जो उस वक़्त एक किशोर थे इस न्योते से बेहद रोमांचित हो उठे। ये पहली बार था कि वे ऐसे किसी जलसे में जा रहे थे। लेकिन उन्हें ज़रा भी अंदेशा नहीं था कि ये जलसा उनकी ज़िन्दगी को एक नया मोड़ देने वाला था।

त्तर प्रदेश में शादियों में वेश्याघरो की लड़कियों को लाकर नचवाने का रिवाज़ है। पर अजीत के सामने ये सब पहली बार हो रहा था। लड़कियां, यहाँ तक की किशोरियां नाच रही थी और लोग उन्हें ललचाई हुई नजरो से देख रहे थे। कोई उनके आस-पास आकर हवा में गोलियां चलाता, कोई उन पर पैसे उछालता तो कोई उन्हें जहाँ मर्ज़ी छु कर निकल जाता। मनोरंजन का इतना भद्दा ढंग अजीत की बिलकुल समझ नहीं आ रहा था।

“मुझे बचपन से सिखाया गया था कि औरत देवी का रूप होती है। पर यहाँ तो उन्हें इंसान भी नहीं समझा जा रहा था। इन औरतो के साथ तो यहाँ के मर्द किसी बेजान चीज़ की तरह पेश आ रहे थे,” अजीत आज भी उन बातों को याद कर परेशान होकर बताते है।

अजीत रात भर उन औरतो का वहीँ इंतज़ार करते रहे। सुबह 6 बजे जब नाच-गाना ख़त्म हो गया और वे निकलने लगीं तो अजीत ने एक औरत को रोक कर पूछा कि, “क्या मैं तुम्हारे बच्चो को गोद ले सकता हूँ?”

Ajeet Singh was still in his teens when he realized what he wanted to do.

एक 17 साल के लड़के से ये सवाल सुनकर औरत को हंसी आ गयी। उसने बिना कोई जवाब दिए बाहर का रुख किया। पर अजीत यहाँ रुकने वाला नहीं था। उसने वेश्यालय तक उस औरत का पीछा किया और दो साल तक लगातार उसे समझाने जाता रहा। आखिर दो साल बाद वो औरत मान गयी और उसने अपने तीनो बच्चो को अजीत के साथ भेज दिया।

“मेरे लिए वो सबसे ज्यादा मुश्किल समय था। हमारे गुरुजन और बड़े हमेशा हमें गांधीजी और मदर टेरेसा की तरह बनने की सीख देते है लेकिन जब हम वास्तव में ऐसा कुछ करते है तो उन्हें इस बात से अचानक आपत्ति हो जाती है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। घरवालो से लेकर समाज तक हर किसीने मेरा विरोध ही किया,” – अजीत

पर इन बाधाओं के बावजूद अजीत का इन तीनो बच्चो को पालने का निश्चय बिलकुल अटल था। पर इस पर भी एक गाज तब गिरी जब 1992 में अपने मालिको के दबाव में आकर इन बच्चो की माँ उन्हें वापस अपने साथ ले गयी।

इस घटना के बाद अजीत पूरी तरह टूट चुके थे। पर जिस तरह एक गहरी काली रात के बाद एक नया सबेरा आता है उसी तरह अजीत की इस हार के बात उनकी जीत निश्चित थी। करीब एक साल तक इसी विषय पर सोचते रहने के बाद अजीत ने इन औरतो के लिए कुछ करने की ठानी और वो भी दुगने जोश के साथ। और इस तरह साल 1993 में शुरुआत हुई उनके स्वयं सेवी संस्था ‘गुडिया’ की।

अजीत ऐसे किसी संस्था या व्यक्ति को नहीं जानते थे जो वेश्याओं को इस दलदल से निकालने में उनका साथ दे सकता था। और इसीलिए वे अकेले ही इस रास्ते पर निकल पड़े। वे रोज़ अपने स्कूटर पर कुछ बोरे और कुछ मिठाईयां लेकर निकलते और वेश्यालय के पास जाकर बैठ जाते। शुरू में वेश्याघरो की लड़कियां उन्हें भी अपना ग्राहक समझकर इशारे करती, उन्हें अपने पास बुलाती, पर जल्द ही उनकी समझ में आ गया कि अजीत वहां कुछ और ही करने के इरादे से आते है।

अजीत अपना स्कूटर गली के कोने में खड़ा कर देते, वहीँ बोरियों को बिछा देते और वेश्याओं के बच्चो को मिठाईयां देकर वहां बिठा देते और उन्हें पढ़ाते।

guria3

“हर कोई मुझसे कहता कि, ‘तुम ये नहीं कर सकते। एक अकेला आदमी पूरी दुनियां नहीं बदल सकता।’ और मैं उनसे जवाब में कहता कि मैं जानता हूँ मैं दुनियां नहीं बदल सकता पर उतना ज़रूर करूँगा जितना मैं कर सकता हूँ,” अजीत बताते है।

अजीत का ये मानना था कि शिक्षा से सब कुछ बदल सकता है। पर धीरे धीरे उन्हें मालूम हुआ कि सिर्फ शिक्षा से यहाँ बदलाव लाना नामुमकिन है। पुलिस, दलाल, अधिकारी, नेता सब मिले हुए थे। सब के सब इन लड़कियों को वेश्यावृत्ति से निकालने की बजाय उन्हें उस गंदगी में पड़े रहने को मजबूर कर रहे थे। इन सबसे लड़ना मुश्किल था पर अजीत ने इस मुश्किल से लड़ने की ठानी।

मुद्दा ये था कि ये लड़कियां पढ़ लिख भी जाती तो इस जगह से बाहर आती कैसे? बाहर आकर करती क्या? और जब बाहर कमाई का कोई ज़रिया नहीं मिलता तो वापस वहीँ पहुँच जाती। अजीत ने इन लड़कियों के लिए सबसे पहले रोज़गार मुहैया करने का निश्चय किया। हालाँकि उन्होंने कभी भी ऐसी किसी भी औरत पर प्रश्न नहीं उठाये जो ये काम अपनी मर्ज़ी से करती थी और न ही उन पर इस काम को छोड़ने का दबाव डाला। उनका मकसद सिर्फ उन लड़कियों को यहाँ से निकालना था जिनसे ज़बरदस्ती ये काम कराया जा रहा था।

1996 में अजीत को CRY से फ़ेलोशिप मिली। इन पैसो से उन्होंने गुडिया में कुछ और लोगो को नौकरी पर रखा और अब वे पुलिस और व्यवस्था के खिलाफ लड़ने लगे। पुलिस की रेड में सिर्फ वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं को ही पकड़ा जाता था। उनके मालिको और दलालों पर तो आंच भी नहीं आती थी। पर दरअसल ये महिलायें तो केवल इन दलालों के हाथो की कठपुतलियां थी। जब पुलिस इन्हें पकडती तो जमानत की रकम के लिए इन्हें घूम फिरकर इन्ही दलालो और वेश्याघर के मालिको की मदद मांगनी पड़ती और ये फिर उसी चक्रव्यूह में फंस जाती।

अजीत ने इन भ्रष्ट पुलिस अफसरों और दलालों की शिकायत मानवाधिकार विभाग से करनी शुरू की।

 

guria1

इसी बीच अजीत की मुलाक़ात सांत्वना मंजू से हुई। मंजू अनाथ थी और बनारस के एक अनाथालय में पली बढ़ी थी। वर्ष 2000 में मंजू दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा चुकी थी। जाने से पहले अपनी छुट्टियों में यूँही एक दिन वे गुडिया में आई और फिर वही की होकर रह गयी।

“मेरा हमेशा से एक सपना था कि जब मैं खुद कमाने लगूंगी तो दो बच्चो को गोद लुंगी और उन्हें माँ बनकर पालूंगी। पर जब मैं गुडिया में आई तो वहां ऐसे कई बच्चे थे, जो यहाँ खुश थे। मैंने सोचा क्यूँ न सिर्फ दो बच्चो की बजाय मैं इन सबकी माँ बन जाऊं,” मंजू मुस्कुराते हुए कहती है।

इसके बाद अजीत और मंजू का साथ अटूट हो गया और दोनों ने 2004 में शादी कर ली। आज उनकी 7 वर्षीय बेटी बारिश बृष्टि भी उनकी मुहीम में उनका पूरा साथ देती है।

guria9

वेश्याघरो में नजदीकी से काम करने वाले अजीत और मंजू को एक बात तो समझ में आ गयी थी कि सिर्फ किसी एक मसले के सुलझाने से ये पूरा चक्रव्यूह नहीं तोड़ा जा सकता। अब उन्होंने सिर्फ इन लड़कियों को पढ़ाने या दलालों और अफसरों की शिकायत करने तक ही अपने आपको सीमित नहीं रखा। ये दोनों अब अपनी टीम के साथ लड़कियों की खोज बीन और जासूसी करने लगे और फिर उन्हें वहाँ से निकालकर लाने लगे।

2005 में अजीत को एक दिन ये खबर मिली कि बनारस के शिवदासपुर रेड लाइट इलाके में करीब 80-90 लड़कियों को मानव तस्करी कर लाया जा रहा है। अजीत और मंजू ने 5000 लोगो को इकठ्ठा किया और पुलिस को अपने साथ लेकर वहां पहुँच गए। इस घटना में 49 लड़कियों को सुरक्षित बचा लिया गया। करीब 40 दलालों को सलाखों के पीछे भी भेजा गया और 9 वेश्यालयों पर ताले लगा दिए गए। इस पुरे घटनाक्रम का टी.वी चैनलो पर सीधा प्रसारण किया गया।

ये अजीत और मंजू के लिए एक बड़ी जीत थी पर इसके बाद उन्हें जान से मार देने की धमकियाँ मिलने लगी, उन पर झूठे आरोप लगाये गए और कई फर्जी केस भी दर्ज किये गए।

guria6

“हमे आये दिन धमकियाँ मिलती रहती है। कुछ तो हमारी बेटी को लेकर भी होती है। माँ होने के नाते मुझे डर तो लगता है पर फिर एक लड़की का चेहरा मेरे सामने आ जाता है। इस लड़की को मैंने एक वेश्यालय में जासूसी करने के दौरान देखा था। वो सिर्फ सात या आठ साल की होगी। दलालों ने उसे ग्राहकों के सामने लाकर खड़ा कर दिया था। उसके होठ लाल लिपस्टिक से चमचमा रहे थे। पर उसकी आँखे बिलकुल खाली थी, बिलकुल बेजान जैसे वो जिन्दा ही न हो। हम उसे 2009 में वहां से बाहर निकाल लाये पर उसकी वो पत्थर हो चुकी आँखे मैं कभी नहीं भूल सकती।” – मंजू

गुड़िया ने मानव तस्करी के खिलाफ एक विश्वस्तरीय मुहीम की शुरुआत भी की है जिसका नाम है फ्रीडम नाउ । इस मुहीम के तहत स्कूल तथा दुसरे शिक्षा संस्थानों में मानव तस्करी से सम्बंधित विभिन्न कार्यक्रम जैसे कि संगीत, पेंटिंग, साइकिल स्पर्धा वगैराह आयोजित किये जाते है।

इस संस्था ने अब तक 1405 लोगो को बंधुआ मजदूरी और वेश्यावृत्ति से बचाया है। इसी संस्था द्वारा भारत का ऐसा पहला पारंपरिक संगीत और नृत्य दल बनाया गया है जिसमे वेश्यावृत्ति से बचायी गयी महिलाएँ अपनी कला का प्रदर्शन करती है। इस दल ने भारत के कई नामी गिरामी मंचो पर अपनी कला प्रस्तुत की है जिससे लोगो में जागरूकता फैली है तथा इन महिलाओं को जीवन यापन के लिए एक रोज़गार का जरिया भी मिला है।

गुडिया ने अब तक 1000 से भी ज्यादा बच्चो की शिक्षा में मदद की है। फिलहाल वे 350 बच्चो की शिक्षा की ज़िम्मेदारी उठा रहे है जिनमे से 180 बच्चे व्यवाहरिक स्कुलो में जाते है।

guria5

 

“सिर्फ ज्ञान होने में और अच्छे और बुरे का ज्ञान होने में एक खासा फर्क होता है। मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चो को सिर्फ ज्ञान नहीं अच्छे बुरे का ज्ञान हो।” – अजीत

 

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें contact@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter (@thebetterindia) पर संपर्क करे।

शेयर करे

Leave a Reply

Your email address will not be published.