बिहार की राजधानी पटना स्थित आईआईटी में प्रवेश के लिये एक अनूठा प्रशिक्षण संस्थान (कोचिंग इन्स्टीट्यूट) है। इसकी विशेषता है कि इसमें नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है और समाज के गरीब एवं पिछड़े विद्यार्थियों को इसमें प्रशिक्षण के लिये चुना जाता है। नि:शुल्क होने एवं पिछड़े बच्चों को लेने के बावजूद भी यह संस्थान प्रतिवर्ष लगभग ३० बच्चों को आईआईटी में प्रवेश-पात्रता (क्वालिफाई) दिलाने में सक्षम होता आया है।

प्रतिवर्ष यह इंस्टीयूट गरीब परिवारों के 30 प्रतिभावान बच्चों का चयन करती है और फिर उन्हें बिना शुल्क के आईआईटी की तैयारी करवाती है। इंस्टीयूट इन बच्चों के खाने और रहने का इंतजाम भी बिना कोई शुल्क करती है। इंस्टीयूट केवल 30 बच्चों का चयन करती है और इसी आधार पर इसे सुपर 30 नाम दिया गया था।

सुपर 30 इंस्टीट्यूट की शुरुआत सन 2003 में हुई थी। इस वर्ष सुपर 30 के 30 में से 18 विद्यार्थी आईआईटी में सफल हुए थे। 2004 में यह संख्या 22 और सन 2005 में यह 26 हो गई।

श्री आनन्द कुमार इसके जन्मदाता एवं कर्ता-धर्ता है। आनंद कुमार रामानुज स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स नामक संस्थान का भी संचालन करते हैं। सुपर-30 को इस गणित संस्थान से होने वाली आमदनी से चलाया जाता है।

इसी सन्दर्भ में हाल ही में आनंद कुमार ने फेसबुक पर एक पोस्‍ट साझा किया है, जिसमें उन्‍होंने कानपुर से 60 किलोमीटर दूर देहा गांव की शिवांगी की कहानी बताई है।

आनंद कुमार

आनंद कुमार

जब शिवांगी काफी छोटी थी तब अपने पिता के साथ अखबार बेचती थी। वह एक सरकारी स्‍कूल में पढ़ती थी। इंटर तक की पढा़ई करने के बाद वह पिता के काम को पूरी तरह से संभाल चुकी थी। इस दौरान एक दिन उसे सुपर 30 के बारे में पता चला। वह अपने पिता के साथ  आनंद कुमार से मिली और उनका सेलेक्‍शन सुपर 30 में हो गया।

इसके बाद शिवांगी ने पूरी मेहनत और लगन से पढाई की और कभी अखबार बेचने वाली शिवांगी का दाखिला आईआईटी रूरकी में हो गया। इसके बाद वह आज एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छे ओहदे पर नौकरी कर रही है। शिवांगी की इस उपलब्‍धि से आज आनंद कुमार, उनकी मां और उनका पूरा परिवार बेहद खुश है।

आनंद कुमार द्वारा लिखित शिवांगी के बारे में पूरा पोस्ट इस प्रकार है –

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ये दो तस्वीरों की एक ही कहानी है | ये तस्वीरें आईना भी हैं और अश्क भी | इनमे कल भी है और आज भी | सुर भी साज भी | इन तस्वीरों में बीते कल की ख़ामोशी है और आज की बुलंदी भी | ये दोनों तस्वीरें मेरी शिष्या शिवांगी की है | एक उस समय कि जब शिवांगी अपने पिता के साथ सुपर 30 में पढ़ने आई थी और एक अभी की | स्कूल के समय से ही वह अपने पिता के साथ सुपर 30 में पढ़ने आई थी और एक अभी की | स्कूल के समय से ही वह अपने पिता को सड़क के किनारे मैगज़ीन और अख़बार बेचने में मदद किया करती थी | जब पिता थक जाते या खाना खाने घर जाते तब शिवांगी ही पूरी जिम्मेवारी संभालती थी |

लेकिन उसे जब भी समय मिलता पढ़ना वह नहीं भूलती थी | शिवांगी उत्तर-प्रदेश के एक छोटे सी जगह डेहा (कानपुर से कोई 60 किलोमीटर दूर) के सरकारी स्कूल से इंटर तक की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी | एक दिन उसने अख़बार में सुपर 30 के बारे में पढ़ा और फिर मेरे पास आ गई |

सुपर 30 में रहने के दरमियान मेरे परिवार से काफी घुल-मिल गयी थी शिवांगी | मेरे माताजी को वह दादी कह कर बुलाती थी और हमलोग उसे बच्ची कहा करते थे | कभी माताजी की तबीयत ख़राब होती तब साथ ही सो जाया करती थी | आई. आई. टी. का रिजल्ट आ चुका था और वह आई. आई. टी. रूरकी जाने की तैयारी कर रही थी | उसके आँखों में आसू थे और मेरे परिवार की सभी महिलाएं भी रो रहीं थी, जैसे लग रहा था कि घर से कोई बेटी विदा हो रही हो | उसके पिता ने जाते-जाते कहा था कि लोग सपने देखा करते हैं और कभी-कभी उनके सपने पूरे भी हो जाया करते हैं | लेकिन मैंने तो कभी इतना बड़ा सपना भी नहीं देखा था |

आज भी शिवांगी मेरे घर के सभी सदस्यों से बात करते रहती है | अभी जैसे ही उसके नौकरी लग जाने की खबर हमलोगों को मिली मेरे पूरे घर में ख़ुशी की लहर सी दौड़ गयी | सबसे ज्यादा मेरी माँ खुश हैं और उनके लिए आखों में आंसू रोक पाना मुश्किल हो रहा है | उन्होंने बस इतना ही कहा कि अगले जनम में मुझे फिर से बिटिया कीजियो |

शिवांगी और उनके जैसे सुपर 30 के सभी होनहार छात्रों को ‘द बेटर इंडिया’ की ओंर से ढेरों शुभकामनाएं!

 

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