आर के नारायण अंग्रेजी साहित्य के सबसे महान उपन्यासकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने दक्षिण भारत के काल्पनिक शहर मालगुड़ी को आधार बनाकर अपनी रचनाएं की। 10 अक्टूबर 1906 के दिन जन्मे नारायण को अपने उपन्यास ‘गाइड’ के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तथा पद्मविभूषण से भी अलंकृतकिया गया था। उनके उपन्यास ‘गाइड’ पर बनी फिल्म में उन्हें लोकप्रियता का एक और आयाम दिया, जिसे आज भी याद किया जाता है।

अंग्रेजी में ‘मालगुड़ी डेज’ नाम से प्रसिद्ध उनके कहानियों के संकलन का जब टेलीविज़न पर नाट्य रूपांतर किया गया तो दर्शक मानो स्वामी की दुनिया में खो से गए।

इस महान लेखक की कहानियाँ अंग्रेजी में होने के कारण कही हिंदी पाठको को इससे वंचित न होना पड़े इसलिए श्री. महेंद्र कुलश्रेष्ठ ने इन्हें हिंदी में भी अनुवादित किया।

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‘मालगुड़ी डेज’ कहानी संग्रह का हिंदी अनुवाद ‘मालगुड़ी की कहानियाँ’, भाषा की सारी बाधाएं पार करके आपको आर. के. नारायण की इसी काल्पनिक दुनियां की सैर कराएगी।

पेश है इसी अनुवादित कहानी संग्रह की पहली कहानी के कुछ अंश –

ज्योतिषी का एक दिन

ठीक दोपहर के समय वह अपना थैला खोलता और ज्योतिष की दुकान लगाता : दर्जन भर कौड़ियाँ, कपड़े का चौकोर टुकड़ा जिस पर कई रहस्यमय रेखाएं खिंची थीं, एक नोटबुक ताड़पत्रों की एक किताब। उसके माथे पर बहुत-सी भभूत और थोड़ा-सा सिंदूर लगा होता, और आँखों से एक तिरछी चमक यह देखने के लिए निकलने लगती कि ग्राहक उसकी तरफ आ रहे हैं या नहीं, लेकिन सीधे-सादे लोग इसे दैवी-शक्ति मानकर भरोसे का अनुभव करते। उसकी आँखों की शक्ति, चेहरे पर सबसे ऊपर लगी होने के कारण भी बढ़ जाती- ऊपर माथे पर प्रभावी तिलक और नीचे गालों तक फैली बड़ी काली मूँछों के बीच दमकती दो आँखें : किसी अल्प बुद्धि के लिए भी इस तरह सजी आँखें बड़ी कारगर सिद्ध होतीं। प्रभाव जमाने के लिए वह सिर पर गेरुआ रंग की पगड़ी भी पहनता- यह रंग हमेशा सफलता प्रदान करता था। लोग उसकी तरफ इस तरह आकृष्ट होते, जैसे फूलों पर मक्खियाँ गिरती हैं।

टाउन हॉल के पार्क से लगे रास्ते पर वह इमली की एक विशाल वृक्ष की दूर-दूर तक फैली टहनियों की छाया में विराजमान होता है। यह एक ऐसी जगह थी। जहाँ सवेरे से देर रात तक लोगों की भीड़ गुज़रती रहती। सँकरी लम्बी सड़क पर दोनों तरफ तरह-तरह की छोटी दुकानें लगी होतीं : घरेलूं दवाएं बेचने वाले, चुराए हुए लकड़ी-लोहे के सामान की दुकानें, जादूगर और सस्ते कपड़े की एक दुकान, जिसके लोग ज़ोर-जोर से चिल्लाकर हर वक्त लोगों को बुलाते रहते। इसी के बगल में इसी तरह शोर करने वाली एक मूँगफली विक्रेता, जो हर दिन अपनी चीज़ को एक नया नाम देता, किसी दिन बंबई की आइस्क्रीम, किसी दिन दिल्ली के बादाम, किसी राजा की सौगात, और लोग हर वक्त उससे खरीददारी कर रहे होते।

भीड़ के बहुत सारे लोग ज्योतिषी को भी घेरे रहते। वह बगल में लगी मूँगफलियों के बड़े-से-ढेर के ऊपर धुँआ देती जलनेवाली आग से निकलती हलकी रोशनी से ही अपना काम चलाता। यहाँ म्युनिस्पैलिटी ने कोई रोशनी नहीं मुहैया कराई थी। दुकानों पर लगी छोटी-छोटी रोशनियों से ही सबको काम चलाना पड़ता था। एक-दो के पास गैस के हंड़े भी थे, जिनमें से हर वक्त ‘सूँ’ की आवाज़ निकलती रहती, कुछ दुकानों पर खंभों से रोशनी की नंगी लपट निकलती रहती, कुछ साइकिलों के छोटे-छोटे लैम्पों से काम चलाते, और ज्योतिषी की तरह कुछ अपनी रोशनी के बिना ही दूसरों के भरोसे गुज़ारा कर लेते। तरह-तरह की इन बहुत-सी रोशनियों से एक अलग ही मंजूर बनता, जिनके बीच में चलते-निकलते लोगों की छायाएं अपना रहस्यमय समाँ बाँध देतीं।

ज्योतिषी को यह माहौल इसलिए बहुत सही लगता क्योंकि जब उसने जिन्दगी शुरू की थी तब ज्योतिषी तो बनना ही नहीं चाहता था; दूसरों की ज़िन्दगी में क्या होने वाला है, यह जानना तो दूर, वह यह भी नहीं जानता था कि उसकी अपनी जिन्दगी में अगले मिनट क्या होने वाला है ! तब उसे न तो सितारों की कोई जानकारी थी, न उन बेचारे लोगों की, जो उसके ग्राहक बनते। बातें करने में जो कुशल था, जो लोगों को खूब पसंद आतीं।’ इसलिए अनुमान और अभ्यास से इस काम में उसने अच्छी महारत हासिल कर ली। यह नहीं, दूसरे सभी धंधों की तरह यह धंधा भी उतना ही ईमान का धंधा था, और दिन भर की मेहनत के बाद वह जो भी कमाई शाम को घर ले जाता, वह ईमान की ही कमाई थी।

उसने जब गाँव छोड़ा, तब यह नहीं सोचा था कि क्या करेगा। गाँव में ही रहता तो वही सब काम करता जो पुरखे करते आये थे, यानी खेती का काम, शादी और बच्चे, और पुराने घर में हमेशा की तरह गुज़र-बसर। लेकिन यह नहीं होना था। उसे बिना किसी को बताये घर छोड़ना पड़ा था और आस-पास नहीं, करीब दो सौ मील ज्यादा दूरी थी, दोनों स्थलों के बीच एक समुद्र की तरह।

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