हमारी नाक पर बैठे दो लेंस जो अपनी लम्बी टांगों को हमारे कानों के पीछे अड़ा कर बड़े मज़े से आराम फ़रमाते हैं, जी हाँ हमारा आशय है ऐनक यानि चश्मे से। एक ऐसी मुसीबत जिसे हमने बड़ी सहिष्णुता से अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है। और जब किसी ने इससे होने वाली परेशानी की बात कही, तो एक नई मुसीबत इसके हल के रूप में सामने आई, जिसने इन दो लेंसों को ठीक हमारी आँखों के अन्दर जगह दे दी, यानि कौन्टेक्ट लेंसेज़। इतना ही नहीं, इस के बाद आई वह हृदयविदारक लेज़र सर्जरी जो हमारे जेब में छेद करने से नहीं चूकती।

अब समय आ चुका है कि हम बीमारी के लक्षणों का उपचार करना बंद करें। हमें समस्या की जड़ को ढूंढना होगा, और विश्वास करिए समाधान अवश्य मिलेगा। आप अपनी आंखों की पावर कम कर सकते हैं और बेहतर ढंग से देख सकते हैं, या फिर हमेशा के लिए चश्मे को अलविदा भी कह सकते हैं।अगर आप सोच रहे हैं कि यह सब होगा कैसे, तो चलिए हमारे साथ पौन्डिचैरी।

The School for Perfect Eyesight

द स्कूल फॉर पर्फेक्ट आइसाइट’, पौन्डिचैरी

यहाँ के ‘द स्कूल फॉर पर्फेक्ट आइसाइट’ में मात्र एक सप्ताह का विश्राम और आँखों का व्यायाम आपकी आँखों को बेहतर करने में बेहद मददगार साबित हो सकते हैं।

‘द स्कूल फॉर पर्फेक्ट आइसाइट’, पौन्डिचैरी स्थित अरबिन्दो आश्रम की एक अनोखी पहल है । यह स्कूल असल समस्या और उसका समाधान ढूंढने में आपकी मदद करता है।

घंटों  बिना पलक झपकाए अपने कम्प्यूटर सक्रीन को देखते रहना, टीवी देखना या फिर पढ़ते रहना आज की जीवन शैली का अंग हैं। इस सबके दौरान हमें यह अहसास भी नहीं होता कि हम अपनी आंखों पर कितना ज़ोर डाल रहे हैं। इसी के फलस्वरूप हमें सरदर्द, आंखों में सूजन, आंखों का लाल रहना और दृष्टि का कम होना जैसी शिकायतें रहती हैं।

यह स्कूल हमें उन सारे कारणों से अवगत कराता है जिनसे हमारी आँखों की हानि होती है, और उनका समाधान भी बताता है। 1968 में डॅा आर एस अग्रवाल, जो बेट्स मैथड के विशेषज्ञ एवं समर्थक हैं, ने ‘द स्कूल फॉर पर्फेक्ट आइसाइट’ की शुरुआत की थी। बेट्स मैथड दृष्टि बढ़ाने का एक वैकल्पिक उपचार है। इसमें विश्राम और ध्यान की अलग अलग तकनीकों द्वारा आंखों का प्राकृतिक रूप से उपचार किया जाता है।

स्कूल में मौजूद विशेषज्ञ आपको कई तरह के नेत्र व्यायाम सिखाते हैं, साथ ही सूर्य चिकित्सा, पामिंग, गेंदों से व्यायाम, मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई, आँखों की मालिश और ऐसे ही कई और उपचार करते हैं। ये बड़ी ही सरल चीजें हैं जो आप उपचार के बाद घर पर या दफ़्तर में बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इस एक सप्ताह के इलाज के दौरान टीवी देखना एवं कम्प्यूटर पर काम करना वर्जित रहता है। इस चिकित्सा के बाद आप अपने यहाँ आने के फ़ैसले पर बेहद खुश होंगे।
आप यही सोच रहे होंगे कि क्या यह वाकई  इतना असरदार है, तो यकीन मानिए मैंने और मेरे पति ने यह खुद अनुभव किया है। जब हमारी आँखों की पावर प्राकृतिक रूप से कम होने लगी तो हमें कैसा महसूस हुआ यह शब्दों में बता पाना मुश्किल है। हर साल करीब  3000 मरीज़ यहां आते हैं जिनकी उम्र 7 साल या उससे अधिक होती है। ऐसे अनेक लोगों की कहानियां हैं जो अपनी दृष्टि बचा पाने की उम्मीद खो चुके थे लेकिन यह स्कूल उनके लिये वरदान साबित हुआ। स्कूल प्रशासन इस बात से इनकार करता है कि यहां कोई जादू या चमत्कार किया जाता है। साथ ही इस स्कूल की कोई मार्केटिंग भी नहीं की जाती है। यहाँ पर जो भी सेवाएं दी जाती हैं वे निशुल्क हैं। जब हमने इसकी वजह जाननी चाही तो यहाँ के एक विशेषज्ञ सन्तोश ने हमें बताया, “ज़्यादातर लोग यहाँ तभी आते हैं जब उनकी सारी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं, हर कहीं से निराशा ही हाथ लगती है। ऐसे में हम उन पर खर्चे का कोई अतिरिक्त बोझ नहीं डालना चाहते। और जब हमारे उपचार से वे ठीक हो जाते हैं तब हमें अत्यन्त आनंद मिलता है। असल में यही हमारा इनाम है।”

अगर आप यह सोच रहे हैं कि पौन्डिचैरी जैसे पर्यटक स्थान  में रहने का कितना खर्चा होगा तो निश्चिन्त हो जाइए। क्योंकि अरबिन्दो आश्रम आपका इलाज पूरा होने तक मात्र रु 160 प्रतिदिन में आप के रहने का इन्तज़ाम करता है। इसके लिए आपको पहले से दोनों जगहों पर – यानि स्कूल और आश्रम में बुकिंग करानी होगी।

यहाँ पर उन बच्चों की भी चिकित्सा की जाती है जिन्हें बचपन में ही मोटे-मोटे चश्मे चढ़ गए हों । चिकित्सा के बाद जीवन भर दृष्टि की किसी भी समस्या की चिंता करने की जरूरत नहीं। अगर हम सभी स्कूलों में यह प्रयोग शुरू कर पाएं तो इसके बहुत अच्छे और दूरगामी परिणाम आ सकते हैं।

यह स्कूल वाकई बहुत बेहतरीन काम कर रहा है। आपको यहाँ एक बार ज़रूर आना चाहिए।

ज़्यादा जानकारी के लिए स्कूल की वेबसाइट पर जाएं,  या सम्पर्क करें +(91)-(413)-2233659

 

मूल लेख: रंजिनी शिवस्वामी
रूपांतरण: अर्चना दीक्षित

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