!!या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।

दुर्गा पूजा की शुरुआत आज महालया से हो चुकी है। माँ दुर्गा के आगमन की पुरे देश में हर्षौल्लास से तैयारी हो चुकी है। पर माँ के भक्तो में कुछ भक्त ऐसे है जो उनके आगमन की तैयारी पुरे साल करते है। और इन्ही की मेहनत से माँ मानो सच में प्रत्यक्ष रूप में हर जगह विराजमान होती है।

ये भक्तो की टोली है कोलकाता के कारीगरों की, जो देश और विदेश में कुमारटूली के नाम से प्रसिद्ध है।

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जिस तरह फिल्मो के लिए सत्यजीत रे है और कविताओं के लिए गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर, उसी तरह दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए है कुमारटूली। हमारे और आपके लिए इन कारीगरों का ये काम हर साल माँ दुर्गा का वही चेहरा, वही प्रतिमा बनाने भर प्रतीत होता होगा। पर कुमारटूली का हर कलाकार इसे एक साधना समझता है। माँ की हज़ारो प्रतिमाएं यहाँ हर साल बनती है और देश विदेशो में पहुंचाई जाती है।

धुप, बारिश, बरखा से बचा कर, अपने तयखाने-नुमा छोटे से स्टूडियो के, बल्ब की धीमी सी रौशनी में ये लोग माँ दुर्गा के चेहरे के हर भाव को उभारते है।

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और साथ में उभर कर आते है माँ दुर्गा की चारो संताने – लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय। महिषासुर की मूर्ती के चेहरे पर क्रोध के साथ-साथ पीड़ा दिखाना भी कोई बच्चो का खेल नहीं होता।

कोलकाता के बर्नामाली स्ट्रीट पर बसे इन कारीगरों के कई स्टूडियो में से एक है चायना पाल का, जो सबसे मशहूर कारीगरों में से एक मानी जाती है। भले ही कला का किसी जाती, धर्म या लिंग विशेष से कोई वास्ता नहीं है पर फिर भी माँ दुर्गा की विशाल मूर्ति बनाने की इस कला से बहुत ही कम महिलायें जुड़ी हुई है।

कुमारटूली शिल्पी समिति के सचीव, श्री. रणजीत सरकार का कहना है, “जहाँ तक कुमारटूली की बात है तो यहाँ के कलाकारों में से बस पांच या छह ही महिलायें है।”

चायना 17 साल की उम्र से इस कला से जुड़ी हुई है। इस कला पर पुरुषो की अधिक सत्ता होने के बावजूद उन्होंने इस क्षेत्र में अपना एक अलग मकाम बनाया है।

चायना पाल की कहानी शुरू होती है 1994 के उन दुर्भाग्यपूर्ण दिनों से जब उनके पिता बहुत ज्यादा बीमार रहने लगे। 70 साल से मूर्ती बनाने के काम में लगे उनके परिवार में, उनके पिता के बाद कोई भी मूर्तिकार नहीं बचा था।

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चायना बताती है, “मेरे दो भाई थे, जो इस काम को नहीं अपनाना चाहते थे और तीन बहने भी थी जिनकी मूर्तियाँ बनाने में कोई रूचि नहीं थी। ऐसे में अपने परिवार के इस पारंपरिक काम को बचाए रखने का ज़िम्मा मैंने अपने सर ले लिया।”

चायना की सबसे बड़ी चुनौती इस पुरुष प्रधान पेशे में अपने पैर ज़माने की थी। उनके पिता के गुज़र जाने के बाद उनके ग्राहकों को ये शंका थी कि क्या एक महिला इतनी मेहनत और बारीकी का काम कर पाएगी?

पर चायना ने अपनी लगन और एकाग्रता से असंभव को संभव कर दिखाया। भले ही इस हुनर की हर बारीकी को सीखने में उन्हें वक़्त लगा पर अब इस कला के जानकार उन्हें दशभूजा (दस हाथो वाली ) के नाम से जानते है। कार्यक्षेत्र और घर, दोनों ही जगह को उतनी ही कुशलता से संभालकर चायना ने यह उपनाम हासिल किया है।

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चायना आज भी उसी पारंपरिक तरीके से मूर्तियाँ बनाती है, जैसे उनके पिता और दादाजी बनाया करते थे। उनके पास इस समय आठ कारीगर काम करते है। वे अपने सभी कारीगरों का भी बहुत ध्यान रखती है। जब एक बार मूर्तियाँ बन कर तैयार हो जाती है और दशहरे का जश्न पूरा हो जाता है तो वे और उनके सभी कारीगर मिलकर घुमने जाते है।

पर चायना के इस सफ़र में केवल प्रसिद्धी और प्रशंसा ही है ऐसा नहीं है। अपने कुछ साहसी कदमो के चलते उन्हें कई आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है।

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पिछले साल जब पारंपरिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए चायना ने एक किन्नरों के समूह के लिए अर्धनारीश्वर के रूप में माँ दुर्गा की मूर्ती बनायी तो मिडिया में उनके इस बेबाक कदम की बहुत सराहना की। पर इसके विपरीत स्थानीय लोगो ने परम्पराओं को तोड़ने के लिए उनकी बहुत आलोचना की।

पर इन आलोचनाओं से चायना की सोच पर कोई असर नहीं पडा। वे कहती है, “हर किसी को माँ दुर्गा की अराधना करने का अधिकार है। किन्नरों को भी।  तो फिर जब उन्होंने मुझसे उनके ही रूप में मूर्ती बनाने का अनुरोध किया तो मैं उन्हें कैसे मना कर देती।

किन्नर समूह के प्रवक्ता भानु नस्वर बताते है, “हम चाहते थे कि कोई महिला हमारे लिए माँ की मूर्ती बनाए। और इसलिए हमने चायना दी से इसका अनुरोध किया।  जहाँ बाकी सभी कलाकारों ने हमे ना कह दिया था वही चायना दी ने कम समय रहते हुए भी इस काम को ख़ुशी ख़ुशी हमारे लिए किया। “

बेशक अब कई महिला मूर्तिकार इस क्षेत्र में उभर कर आ रही है पर चायना ने सबसे पहले इस काम की शुरुआत कर के उन सभी महिलाओं के लिए इस क्षेत्र के द्वार खोल दिए है।

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अक्सर कुमारटूली की बात होती है, तो नज़र आते है, बिना कमीज़ पहने, पसीने से लथपथ शरीर और मिट्टी से सराबोर पुरुषो के हाथ। और इनके बीच किसी महिला मूर्तिकार की कल्पना कर पाना भी असंभव सा लगता था। पर चायना इन सबके बीच आई, उन तंग छोटे से स्टूडियो के अन्दर घुसी जहाँ आज की युवा पीढी आने से कतराती है और इसीलिए इस कला को नहीं अपनाते। पर इस असंभव को संभव करने वाली चायना ने इस क्षेत्र में आज अपना एक अलग मकाम बनाया है।

जब चायना से उनके नाम का मतलब पूछा गया तो वे जोर से हंस पड़ी और बताया कि बंगाली में चायना का मतलब होता है, ‘नहीं चाहिए’। चायना अपने माता पिता की चौथी संतान थी और उन्हें और बेटियां नहीं चाहिए थी इसीलिए उनकी माँ ने उनका नाम चायना रख दिया था। और इसे नियति का खेल ही कह लीजिये कि जिस माँ को ये बेटी नहीं चाहिए थी, आज वही माँ चायना के साथ ही रहती है और चायना ही उनका ख्याल रखती है।

“अब वक़्त बदल चुका है, आज इसी अनचाहे नाम से मैं जानी जाती हूँ और मेरी पहचान इसी से है।”

धीरे धीरे शाम हुई और आरती के धुंएँ, शंख की ध्वनि और ढाक के मधुर स्वर के बीच एक गूंज सुनाई दी, ‘ढाक बाजछे… माँ आशछे’ (ढाक बज रहा है …. माँ आ रहीं है)

शुभ दुर्गा पूजा !

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