किसान‘ – हवा और पानी के बाद, हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग! क्यूंकि किसान हमारे लिए वो खाना उगाते है जिसके बगैर हम जिंदा नहीं रह सकते, जिसके लिए हम दिन रात मेहनत करते है। पर क्या हमने कभी सोचा है कि हमारे लिए खाना उगाने वाले इस किसान को खुद खाने को मिल भी रहा है या नहीं? सुखा, असमय बारिश, बाज़ार में उचित दाम न मिलना, सूदखोर महाजन से उधार लिए पैसे का ब्याज, गरीबी, लाचारी और फिर एक दिन आत्महत्या! बस यही है संक्षेप में हमारे देश के छोटे किसानो का जीवन!

सी ही परिस्थितियों से गुज़र कर महाराष्ट्र के ओस्मनाबाद जिले के सिराधन गाँव का मोहन, दो साल पहले, एक बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में, अपने परिवार के साथ, महानगरी मुंबई चला आया। मोहन तब केवल 16 साल का था। गाँव में अपने पिता और दो भाईयों के साथ मोहन भी खेत में जाया करता। 2 एकड़ की छोटी सी ज़मीन में बस इतना ही उग पाता था, जिससे इन पांच प्राणियों का पेट भर सके। पर फिर सूखे ने दो समय के उन निवालो को भी उनसे छीन लिया। कर्जे का बोझ इतना था कि तीनो बाप-बेटे ज़िन्दगी भर भी मजदूरी करते तो न चुकता।

ऊपर से कई साल पहले एक ट्रेन के नीचे आ जाने से मोहन के पिता का एक पाँव भी कट चुका था। वे जैसे तैसे एक ही पाँव से खेतो में काम किया करते, जिसमे उनके भाई भी उनका साथ देते। पर अब पानी सर से ऊपर जा चूका था। उधार देने वाले तकादा करने लगे थे। मोहन और उसके भाइयों की पढाई तो कबकी छूट चुकी थी। सातवी तक पढ़ा मोहन कई बार अपने पुराने पाठ याद कर कर के थक चूका था। वो स्कूल जाना चाहता था, नए पाठ पढना चाहता था, कुछ बनना चाहता था। पर जिस घर में सुबह सुखी रोटी खाने के बाद रात के खाने के लिए एक दाना न बचा हो वहां भला किताबो और स्कूल के बारे में कौन सोचता।

जब मोहन के पिता ने मुंबई जाने की बात कही तो अनायास ही मोहन की आँखे चमक उठी। उसे लगा कि शायद मुंबई जैसे बड़े शहर में उसके पिता और दोनों भाइयों को इतना को कमाने को मिल ही जायेगा कि वो एक बार फिर स्कूल जा पायेगा।

2014 में मोहन के पिता, प्रभु काले ने अपनी ज़मीन और घर बेचकर देनदारो के पैसे चुकाए और खाली हाथ अपने परिवार को लेकर मुंबई चले आये।

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मोहन प्रभु काले

यहाँ न घर था न ज़मीन। घर के बदले एक छत मिली… तीन हाट नाका फ्लाईओवर की छत, जहाँ उन्ही के जैसे और भी उजड़े हुए किसान रह रहे थे। ये हंसता खेलता परिवार अब सड़क पर आ चुका था। इसी फ्लाईओवर के तले मोहन फिर स्कूल जाने के अपने सपने बुनने लगा। अगली सुबह से काम की तलाश शुरू हुई।

मोहन के पिता जो गाँव में एक ही पैर के सहारे सारा खेत जोत देते थे, यहाँ अपाहिज कहलाये जाने लगे और उन्हें कोई काम देने को तैयार न हुआ। पर परिवार का पेट तो पालना था! सो, इस मेहनती किसान ने हाथ में कटोरा थाम लिया और अपने स्वाभिमान को कुचलकर भीख मांगने लगा। मोहन, उसके दोनों भाई और माँ फूलो के गजरे बना बना तीन हाट नाका पर बेचने लगे।

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मोहन सिग्नल पर गजरे बेचने लगा

दो साल बीत गए। मोहन अब 18 का हो चूका था। गजरे बेचते-बेचते, लोगो से उन्हें खरीदने की मिन्नतें करते-करते वो पढने या स्कूल जाने के सपने देखना भूल चुका था। उसने इस सच्चाई के साथ जीना सीख लिया था कि उसे अपनी सारी ज़िन्दगी एक वक़्त का खाना खाने के लिए दिन भर गजरे बेचना होगा। और जिस दिन वो गजरे नहीं बेच पायेगा उस दिन उसे भूखे ही सोना पड़ेगा।

पर फिर एक दिन अचानक उसके पास कुछ लोग आये। उन्होंने मोहन से पुछा कि क्या वो पढना चाहता है? ये सुनकर मोहन ने तुरंत हाँ कहा पर साथ ही ये भी बताया कि उसके पास स्कूल जाने, किताबे खरीदने या यूनिफार्म के पैसे नहीं है। सुनकर प्रश्न पूछने वाले मुस्कुरा दिए और मोहन का नाम लिख लिया गया।

कुछ दिन बाद समुद्री जहाज में इस्तेमाल होने वाला एक पुराना कंटेनर तीन हाट नाका फ्लाईओवर के नीचे लाया गया। उसकी मरम्मत की गयी। उसमे छोटा सा बाग़ बनाया गया, टेबल- कुसियाँ रखी गयी, ब्लैक बोर्ड लगाया गया और मोहन जैसे कई बच्चो को यहाँ बुलाया गया।

ये कंटेनर अब मोहन का नया स्कूल है – भारत की पहला सिग्नल स्कूल जिसे मराठी भाषा में सिग्नल शाला कहा जाता है।

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सिग्नल शाला

ठाणे नगर पालिका द्वारा स्थापित तथा बटु सावंत के नेतृत्व में संगठित स्वयं सेवी संस्था, ‘समर्थ भारत व्यासपीठ’ द्वारा संचालित, सिग्नल शाला, भारत का पहला ऐसा स्कूल है, जो ट्रैफिक सिग्नल पर काम कर रहे या सडको पर रह रहे बच्चो के लिए खोली गयी है। यहाँ सुबह आते ही बच्चो को पहले नहलाया जाता है, उन्हें साफ़ सुथरे यूनिफार्म पहनाये जाते है, उन्हें खाना खिलाया जाता है और फिर उनके उम्र के हिसाब से उन्हें पढाया जाता है। चूँकि मोहन अपने गाँव में सातवी कक्षा तक पढ़ा था इसलिए उसे आठवी कक्षा की पढाई करवाई जा रही है।

सिग्नल शाला की एक कार्यकर्ता, आरती परब ने बताया, “हम मोहन को आठवी की पढाई कराने के साथ ही साथ उसे दसवी के बोर्ड की परीक्षा के लिए भी तैयार कर रहे है। हमारी कोशिश रहेगी कि दसवी के बाद वो कोई तकनिकी शिक्षा हासिल कर ले जिससे उसके और उसके परिवार का भविष्य सुधरे।”

मोहन अब जी लगा के पढता है। रोज़ सुबह पहले वो सिग्नल पर गजरे और फूल बेचता है। फिर जल्दी जल्दी नहा धोकर स्कूल आता है। शाम को चार बजे स्कूल छुटने पर वो एक बार फिर सिग्नल पर रुकी गाड़ियों के शीशे से खरीददारों को गजरे दिखाकर बेचता है। पर अब इन शीशो में उसे अपना भी अक्स दिखाई देता है, वो आँखे दिखाई देती है जिनमे एक बार फिर सपनो ने घर बनाना शुरू कर दिया है।

जब हमने मोहन से पूछा कि वो क्या बनना चाहता है, तो उसने जवाब में हम ही से पूछा, “पता नहीं क्या बनूँगा… पर पढूंगा तो कुछ न कुछ तो ज़रूर बन जाऊंगा, है ना?”

यदि आप मोहन और उसके जैसे कई मासूम बच्चो के सपनो को बचाने में सिग्नल शाला की मदद करना चाहते है तो अपना योगदान देने के लिए यहाँ क्लिक करे ।


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