बबलू मार्टिन क्रिकेट और फुटबॉल खेलते थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी खेल को बढ़ावा देने और लोगो की मदद करने में समर्पित कर दी थी। 20 अगस्त को मध्य प्रदेश के मैय्यर गाँव में एक इमारत के मलबे के निचे फसे हुए ३ बच्चो की जान बचाते हुये बबलू की मौत हुयी।

20 अगस्त को करीब सुबह 10:30 बजे मैय्यर, मध्य प्रदेश के 40 वर्षीय खिलाड़ी बेनेडीक्ट (बबलू) मार्टिन रोज की तरह अपनी कोचिंग क्लास से घर जा रहे थे। रास्ते में मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड के सामने एक छोटी सी दूकान पर चाय पीने के लिये बबलू अपने दोस्तों के साथ रुके।

तभी अचानक बबलू ने देखा कि हाउसिंग बोर्ड की 3 मंजिला इमारत गिरने की कगार पर है।

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उन्होंने देखा कि एक 12 साल की बच्ची ढहती हुयी इमारत के निचे खड़ी थी। तभी बबलू ने तुरंत दौड़कर बच्ची को बचा लिया। बबलू ने और एक बच्चे को भी बचा लिया और तीसरे बच्चे को बचाने के लिये कूद पड़े।

दुर्भाग्यवश तिसरे बच्चे को बचाते हुए बबलू को खुद की जान जोखिम में डालनी पड़ी।

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गिरी हुयी इमारत के निचे बबलू फस गये।

बबलू गिरी हुयी इमारत के निचे पूरी तरह से फंस गये थे। उन्हें मलबे से बाहर निकालने के लिये डेढ़ घंटे से भी ज्यादा वक्त लगा। वहा पर मौजूद लोगो के सिवा कोई सरकारी या वैद्यकीय मदद बबलू को नहीं मिली। लोग बबलू को पास के अस्पताल में ले गये जहा आनन फानन में  उनको टाँके लगा दिए गए और तुरंत उन्हें सतना के बड़े अस्पताल में ले जाने के लिये कहा गया। उस वक्त तक बबलू में जान थी।

जिस एम्बुलेंस में बबलू को ले जा रहा था उसमे उनके बड़े भाई और एक दोस्त के अलावा कोई भी डॉक्टर या वैद्यकीय कर्मचारी नहीं था। बबलू के बड़े भाई और दोस्त के अनुसार जो ऑक्सीजन मास्क बबलू को लगाया गया था, वह बार बार गिर रहा था। पिछले कई दिनों से लगातार बारिश होने के कारण सतना के रास्ते ख़राब थे। इसलिये एम्बुलेंस सतना की जगह कटनी रवाना हुयी जहा डॉक्टर ने बबलू को लाते ही मृत घोषित कर दिया।

बबलू के बड़े भाई राबर्ट (राजू) मार्टिन कहते है, “मेरे भाई ने अपना फ़र्ज़ निभाया। जिन लोगो ने मलबे से बबलू को बाहर निकाला उन्होंने भी अपना फ़र्ज़ अदा किया। पर सरकार और व्यवस्था ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया। यदि हवाई जहाज से आया जाए तो, भोपाल से मैय्यर सिर्फ 1.5 घंटे में पहूँच सकते है। पर मैय्यर का भी कोई डॉक्टर डेढ़ घंटे में हमारी मदद के लिये नहीं आया। अगर उसे प्राथमिक उपचार दिया जाता तो शायद वो बच सकता था। बबलू ने 3 जाने बचायी। अगर जिंदा होता तो शायद वो 30 जाने बचात़ा। एम्बुलेंस में कोई भी डॉक्टर या वैद्यकीय कर्मचारी नहीं थे इसलिये हमें पता भी नहीं चला कि हमारा भाई हमे कब छोड कर चला गया।”

बबलू छत्तीसगढ़ स्टेट क्रिकेट संघ(CSCS) के सदस्य थे। उन्होंने स्टेट क्रिकेट और फूटबाल टूर्नामेंट में सतना का प्रतिनिधित्व किया था। बबलू ने ‘शारदा क्रिकेट कोचिंग सेंटर’ नामक एक कोचिंग सेंटर की भी स्थापना की थी, जिसमे वो बच्चो को मुफ्त में क्रिकेट सिखाते थे।

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बबलू एक ऐसे खिलाड़ी थे, जो क्रिकेट और फूटबाल दोनों में माहिर थे। वो मैय्यर स्पोर्टिंग क्लब में बच्चो को फूटबाल भी सिखाते थे।

बबलू ने मैय्यर में सबसे पहले लडकियों को फूटबाल और क्रिकेट खेलने के लिये प्रेंरित किया। जहां पर लड़कियों ने कभी शौकिया भी फुटबॉल नहीं खेला था, वहीँ 35-40 लडकियां बबलू के मार्गदर्शन में मैय्यर स्पोर्टिंग क्लब में फूटबाल खेलती नज़र आने लगी थी। उनमे से एक लड़की जल्द ही स्टेट लेवल फूटबाल चैंपियनशिप में जिले का प्रतिनिधित्व करने वाली है।

मार्टिन परिवार के दोस्त इस्लाम अहमद कहते है “मार्टिन दिल का बहुत अच्छा था। मैं उसे बचपन से जानता था। बबलू ने ही मुझे विकेट कीपिंग और बैटिंग सिखाया। वो अजहरउद्दीन काबहुत  बड़ा फेन था। बबलू अजहर की फील्डिंग और कपिल देव की बोलिंग से प्रेरित था। वो मैदान में जब फील्डिंग करता था तब दूर से देखकर हर किसीको लगता था मानो अजहर ही फील्डिंग कर रहा हो।”

बबलू को बचपन से ही पढाई में दिलचस्पी नहीं थी। माता-पिता ने बबलू को अलग अलग पांच स्कूलो में पढने के लिये भेजा। इतना ही नहीं उसे अलाहाबाद के बोर्डिंग स्कूल में भी दाखिल किया। पर बबलू को क्रिकेट और अन्य खेलो में दिलचस्पी थी। आठवी कक्षा के बाद बबलू ने स्कूल जाना  छोड़ दिया और खेल में पूरी तरह डूब गया। उसने बच्चो को क्रिकेट और फूटबाल सिखाना शुरू किया। जब भी मैय्यर के अलावा अन्य जगह मैच होती थी तब बबलू बच्चो को खेल का सारा सामान खरीदने के लिये अपनी जेब से पैसे दे देता।

भारत में बच्चो को पढाई पर ध्यान देने के लिये कहा जाता है, लेकिन बबलू ने उन्हें खेलने के लिये हमेशा प्रेरित किया।

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राजू बताते है ,“बबलू को एक बार मलेरिया हुआ था और उसे सलाइन चढ़ाई गयी थी। लेकिन जब उसने सुना कि कोई  टूर्नामेंट हो रहा है तो वो अस्पताल उसने अपनी सलाइन खुद ही हटा दी और किसी को बिना बताये अस्पताल से भाग गया।”

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने बबलू के परिवार को 5 लाख रुपये और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है। उन्होंने ये भी कहा है कि सतना के स्पोर्ट्स कॉम्लेक्स को बबलू का नाम दिया जायेंगा जिससे आने वाली पीढ़ी को खेल में दिलचस्पी होगी। बबलू का भी ये सपना था।

बबलू की माँ और पत्नी अभी भी सदमे में है। उनके दो बच्चे, 6 साल का वैभव और 4 साल का अहम, अभी भी सोचते है कि उनके पिता किसी टूर्नामेंट के लिये बाहर गये है और जल्द ही वापस आयेंगे।

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बबलू के बेटे-वैभव और अहम।

राबर्ट मार्टिन बताते है “चार दिन पहले तक हम सभी घरवाले बबलू से परेशान थे कि वो घर की जिम्मेदारीया नहीं उठाता, जब देखो तब खेल में लगा होता है। पर हमें पता नहीं था कि वो कितना महान काम करता था। उसकी मौत के बाद ही हमें पता चला कि वो दुसरो की कितनी मदद करता था। जिन 40 लडकियों को बबलू फुटबॉल सिखाता था और बाकी सभी जिनकी उसने मदद की थी, वो सब उसकी अंतिम यात्रा में शमशान तक आये थे । हमें गर्व है कि बबलू लोगो की मदद करता था, बच्चो को खेल सिखाता था। इतना ही नहीं उसने 3 बच्चो की जान बचाकर समाज में एक आदर्श रखा है। हमारे पुरे परीवार को बबलू पर गर्व है।”

आप राबर्ट मार्टिन को [email protected]  ईमेल पर लिख सखते है।

मूल लेख मानबी कटोच द्वारा लिखित।


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