बंगलुरु के टाटा शेरवुड रेज़िडेंशिअल सोसाइटी में घरेलू काम करने वालों के बच्चे हर रविवार दोपहर में ट्यूशन करने आते है, जो सोसाइटी में रहने वाले लोगों द्वारा संचालित की जाती है। इस सोसाइटी में रहने वाले लोग, एक स्वैछिक समूह ‘SEE’ के सदस्य हैं जो कि अपार्टमेंट में काम करने वाले कामगारों के बच्चों की स्कूल की सालाना फ़ीस के लिए चन्दा इक्कठा कर मदद करता है।

SEE ( सी ) ग्रुप आठ सक्रिय स्वयंसेवकों का समूह है। ये सदस्य अपने आप को सीकर्स (SEEKERS) कहते हैं और अब ये न केवल बच्चों की पढ़ाई के लिए चंदा इक्कठा कर रहे हैं बल्कि उन्हें पढ़ा भी रहे हैं।

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एक वालंटियर ने बताया, “ इसकी शुरुवात 2014 में दीवाली से दो दिन पहले घटित एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण हुई। हमें पता चला कि सोसाइटी में काम करने वाला बावर्ची अचानक बीमार पड़ गया है। उसका परिवार उसे अस्पताल ले कर गया, जहाँ उसे आँत की कोई गम्भीर समस्या बताई गयी। अस्पताल ने तुरंत ऑपरेशन की बात कही जिसके लिए 4 लाख रूपयो की ज़रुरत थी।“

सोसाइटी में रहने वाले लोगों ने चन्दा इक्कठा कर के उसकी मदद करने की योजना बनायी। उन्होंने अस्पताल प्रशासन से, सरकारी एजेंसियों से और सोसाइटी में रहने वालों से भी इस बारे में बात की जो कि काफी मददगार साबित हुई। उन्होंने सोसाइटी के गूगल ग्रुप पर इससे सम्बंधित एक ईमेल भेजा और 96 घंटों के अंदर ही 3 लाख रूपए का चन्दा इक्कठा हो गया। कुछ दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी इसमें योगदान किया तो कुल मिला कर 4.5 लाख रूपए इक्कठे हो गए। आपरेशन सफल रहा और वह बावर्ची जल्दी ही ठीक भी हो गया। बाद में सोसाइटी के कुछ लोगों ने एक ग्रुप बनाया जिसका पहला एजेंडा था कि चंदे की जो शेष राशि बच गयी है उसका क्या उपयोग किया जाये।

एक वालंटियर बताते हैं, “ बहुत ज़्यादा सोच विचार के बाद हमने ये निर्णय लिया कि इस जमा-पूँजी को हम शेरवुड सोसाइटी में काम करने वालों के हित में लगायेंगे।“

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इस ग्रुप ने एक योजना बनाई कि शेरवुड सोसाइटी में रहने वालों से और चन्दा इक्कठा कर के 150 घरेलू कामगारों के बच्चों की फीस भरी जायेगी। लोग इसके लिए तैयार हो गए और इस शुरूआती पहले साल में हम कक्षा 1 से 10 तक के 40 बच्चों की शिक्षा के लिए पर्याप्त चन्दा जुटा पाये।

एक वालंटियर बताते हैं कि, “ हम खुश भी थे और चिंतित भी कि हमने जो कुछ भी किया वो कुछ बेहतर करने का एक नाकाफ़ी तरीका है। आख़िरकार ये साल भर में केवल 1 महीना ही तो था। उससे भी महत्वपूर्ण बात ये कि इस धन से केवल बच्चों की स्कूल की फीस ही भरी जा रही थी; उनकी शिक्षा में पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही थी।“

तब ग्रुप ने यह फ़ैसला किया कि वो इन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करेंगे। वे लोग उन बच्चों के माता पिता से मिले और उनकी ज़रूरतों को समझा तो पाया कि ज़्यादातर कामगारों को ये पता ही नहीं था कि उनके बच्चे स्कूल में क्या सीख रहे हैं और वे किस तरह से पढ़ाई में पिछड़ते जा रहे हैं। इसके लिए ग्रुप ने एक योजना बनायी कि वो लोग हर रविवार को 2 से 4 घंटे, कक्षा 4 से कक्षा 9 तक के 40 बच्चों को इंग्लिश और गणित की ट्यूशन पढ़ाया करेंगे।

एक सीकर्स बताते हैं, “ हम में से कोई भी पेशे से अध्यापक नहीं है पर हम कोशिश करते हैं कि हम किताबों के प्रति बच्चों की जिज्ञासा और रूचि बनाये रखें। हम उनके व्यक्तित्व के विकास की तरफ भी ध्यान दे रहे हैं। हमें ये देख कर ख़ुशी होती है कि बच्चे इन कक्षाओं से उत्साहित हैं।“

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इस साल ग्रुप ने 175 बच्चों की फ़ीस के लिए चन्दा इक्कठा किया है । दूसरी बड़ी बात ये कि अब वो कक्षा 10 तक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाएंगे। कुछ लोग और सामने आये हैं, जो स्कूल के बाद कक्षा 10 के बच्चों को सप्ताह में छः दिन सभी मुख्य विषयों की ट्यूशन पढ़ाया करेंगे।

आठ सक्रिय वालंटियर्स के अलावा छः और ऐसे लोग ,हैं जिनके पास जब भी वक़्त होगा वो ट्यूशन दिया करेंगे।

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एक और वालंटियर बताते हैं, “ज़्यादातर लोग ये अपेक्षा करते हैं, कि वो कहीं न कहीं कुछ न कुछ ज़रूर करेंगे जिससे परिस्थिति बदलेगी पर 99% परिस्थितियों में ये केवल एक उम्मीद ही रह जाती है। हमारे लिए ये एक ऐसा अवसर है जो हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हमें मिलेगा और हम इसे अपना बेहतरीन देने की कोशिश कर रहे हैं।“

मूल लेख – तान्या सिंह


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