भारत की बेटी दीपा करमाकर ने एक बार फिर इतिहास कायम करते हुए ओलंपिक फाइनल में क्वालीफाई करने वाली भारत की पहली महिला जिम्नास्ट का दर्जा हासिल किया।

रविवार का दिन रियो ओलंपिक में बेहद खास रहा। 22 साल की दीपा करमाकर ने एक ऊंची छलांग लगाते हुए भारतीय इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया। प्रोदुनोवा वॅाल्ट खेल के अंतिम आठ प्रतियोगियों में जगह बनाकर दीपा ओलम्पिक के फाइनल में पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला जिम्नास्ट बन गई है।

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आयोजन में अपना प्रदर्शन करते हुए दीपा ने चार खेलों में क्रमश: 14.850(वॅाल्ट), 11.666 (अनइवेनबार्स), 12.866 (बैलेन्स बीम) और 12.033 (फ्लोरएक्सरसाइज) में स्कोर किया।

उन्होंने सभी खेलों को मिलाते हुए 51.665 स्कोर बनाया और 28वाँ स्थान सुरक्षित किया।

उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन उनके पसंदीदा खेल प्रोदुनोवा वॅाल्ट में रहा। यह एक ऐसा खेल है जिसमें एक छोटी सी गलती से एथलीट लकवाग्रस्त हो सकते है या उनके गर्दन की हड्डी टूट सकती है। इसमें पैरों को मोड़कर हवा में उछलते हुए घूमना होता है।

प्रोदुनोवा वॅाल्ट में वह अपना अच्छा प्रदर्शन करते हुए छठवें स्थान पर चल रही थी, लेकिन यू.एस की सिमोन बाइल्स और कनाडा की शैलोन ओल्सन ने क्रमश: 16.050 और 14.950 स्कोर बनाते हुए उन्हें आठवें स्थान पर कर दिया।

अब अंतिम आठ प्रतियोगियों की मेडल राउण्ड में भिंड़त होगी। प्रतियोगिता का फाइनल 14 अगस्त, 2016 को होगा।

 

दीपा

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दीपा 52 साल बाद  इस आयोजन में क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय है। दीपा से पहले 11 पुरुष जिम्नास्ट ओलम्पिक में क्वालीफाई कर चुके हैं। इसमें  दो 1952 में आयोजित हेलसिन्की ओलंपिक्स में, तीन 1956 में आयोजित मेलबर्न ओलंपिक्स में और छ: 1964 में आयोजित टोक्यो ओलंपिक्स में भाग ले चुके हैं। लेकिन दीपा ओलम्पिक में क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिम्नास्ट है।

ओलंपिक के अतिरिक्त उनकी अन्य कई उपलब्धियाँ भी है। उन्होंने 2014 एशियन  गेम्स में चौथा स्थान प्राप्त किया। हिरोशिमा में आयोजित एशियन चैम्पियनशिप में कांस्य पदक हासिल किया।2015 में आयोजित वर्ल्ड आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक चैम्पियनशिप में पाँचवें स्थान पर रही। राज्य स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक के विभिन्न प्रतियोगिताओं में 2007 से अब तक दीपा 77 पदक जीत चुकी हैं, जिसमें 67 स्वर्ण पदक है।

14 विश्व चैम्पियनशिप में 7 राष्ट्रों के कोच रह चुके जिम होल्ट का कहना है,”दीपा करमाकर वर्तमान में विश्व के सबसे प्रसिद्ध वॅाल्टर्समें से एक है।”

दीपा के रोमांचक सफर की शुरुआत 16 साल पहले हुई, जब वह छ: साल की थी। उनके पिता दुलाल करमाकर अंडमान आयलैण्ड में वेटलिफ्टिंग कोच थे और उन्होंने ही दीपा का परिचय जिम्नास्टिक से कराया था। उस समय तक दीपा की रुचि जिम्नास्टिक में बहुत ज्यादा नहीं थी।

 

दीपा कहती हैं, “2007 में जब मैंने जलपाईगुड़ी में जूनियर नेशनल्स जीता, तो मेरी रुचि इस खेल के लिए और बढ़ गई।”

 

उनके जीवन का सबसे बड़ा  मोड़ तब आया, जब उन्होंने 2010 कॅामनवेल्थ गेम्स में आशीष कुमार को मेडल जीतकर इतिहास रचते हुए देखा।

 

वो कहती हैं, “यही वो क्षण था जब मैंने खुद से कहा कि मुझे ग्लासगो में भारत के लिए पदक जीतना है।”

 

बचपन में दीपा के सपाट पैरों के कारण उन्हें अपने खेल में दुगुनी मेहनत करनी पड़ी। सपाट पैर होने की वजह से दीपा को खेल में काफी दिक्कतें हुई।

 

दीपा के कोच बिस्वेश्वर नंदी कहते हैं,”मुझे याद है दीपा मेरे पास एक सपाट पैर वाले बच्चे के रुप में आयी थी, जो एक जिम्नास्ट के लिए बिल्कुल अच्छा नहीं होता। यह कूदने में पैरों की लचक को प्रभावित करता है।”

 

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इसके अलावा दीपा के सामने एक खराब व्यवस्था भी चुनौती थी। सरकार की ओर से जिम्नास्ट्स को कोई सहायता उपलब्ध नहीं करायी जाती है। दीपा को भी अपनी पहली जिम्नास्टिक प्रतियोगिता में बिना जूतों के और उधार लिए हुए ओवरसाइज कॅास्ट्यूम के साथ प्रदर्शन करना पड़ा था। ऐसा सिर्फ दीपा के साथ ही नहीं है, अन्य एथलीट्स भी सुविधाओं के अभाव को झेल रहे है।

दीपा के पिता हर संघर्ष में उनके साथ डटकर खड़े रहे। उनके कोच बिसेश्वर नंदी से उनके पिता ने ही उन्हें मिलवाया था।

दीपा के ओलम्पिक में क्वारीफाई करने के बाद उनके कोच बिस्वेश्वर नंदी ने कहा,”उसे हर हाल में मेडल चाहिए और अगर उसने पहले की तरह अच्छा प्रदर्शन किया तो वह स्वर्ण भी जीत सकती है।”

भारत की इस बेटी को हमारा सलाम और ढेरो शुभकामनाएं !

 

मूल लेख – कनैप्पिली


 

 

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