बेज़वाड़ा विल्सन को इस साल, एशिया का नोबेल कहे जाने वाले प्रतिष्टित ‘रेमन मैगसेसे पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें मानव मल साफ करने वाले श्रमिकों के उद्धाऱ के प्रति अपूर्व योगदान के लिए दिया गया। बेजवाड़ा कहते हैं कि वे तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक मल उठाने वाला आखिरी व्यक्ति भी अपना काम न छोड़ दे।

               

छूत माने जाने वाले थोटी जाती में जन्में बेज़वाड़ा विल्सन ने बचपन से ही मैला ढोने वालो की दशा देखी थी। कम उम्र से ही वे इस काम को करने वालों की समस्या से भली-भाँति परिचित थे। विल्सन के पिता भी मैला उठाने का काम करते थे। उनके भाई ने कुछ दिन भारतीय रेल में नौकरी की, फिर वो भी इसी काम में लग गए। विल्सन को जब पहली बार अपने परिवेश के बारे में पता चला तो उन्हें गहरा आघात पहुँचा।

 

मैं 13 साल का था जब मुझे पता चला कि मेरे पिता और भाई परिवार का पेट पालने के लिए मल उठाते हैं। ये जानकर मुझे बड़ा झटका लगा। स्कूल में मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाते थे। मैंने कई बार अपने माता-पिता से उनके काम के बारें में जानने की कोशिश की थी, पर वो हमेशा मेरी बात को किसी न किसी तरह टाल देते थे। जब मुझे आखिरकार अपने परिवार के काम के बारे में पता चला, तो मैं मर ही जाना चाहता था,” विल्सन ने बताया।

Bezwada Wilson, the man behind Safai Karamchari Andolan.

बेजवाड़ा विल्सन

 

विल्सन ने पॉलिटिकल साइंस से ग्रेजुएशन किया। इस दौरान वो युवाओं से संबंधित ज्यादा से ज्यादा कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे। उन्होंने पाया कि ज्यादातर बच्चे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। स्कूल छोड़कर वो भी मल उठाने का काम करने लगते हैं।
कर्नाटक के दलित परिवार में पैदा हुए और पले-बढ़े विल्सन ने इस पेशे को जड़ से मिटाने का निर्णय लिया।

 

1993 में ही मानव मल को इंसानों से साफ करवाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। इसके लिए बकायदा कानून बनाया गया, “The Employment Of Manual Scavenging And Construction of Dry Latrines (Prohibition) Act, 1993। लेकिन, दुर्भाग्य से ये कोढ़ हमारे समाज से इतने सालों बाद भी मिट नहीं सका है। लाखों लोग अब भी अमानवीय परिस्थितियों नें सूखा मल उठाने का काम करते हैं।

मानव मल को अपने हाथों से उठाने वाले इस पेशे के खिलाफ विल्सन ने जंग छेड़ दी। उन्होंने खुद को इस समुदाय की तरक्की के लिए समर्पित कर दिया।

n Odisha - pictures from the movies "Marching towards Freedom" by Gopal Menon

उड़ीसा: गोपाल मेनन की फिल्म,”मार्चिंग टुवर्ड्स फ्रीडम’ का एक दृश्य !

 

1995 में उन्होंने इस निम्नीकृत काम से लोगों को आजादी दिलाने के लिए ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन’ की शुरूआत की। उनका उद्देश्य है कि मल उठाने वाले लोग इस काम को छोड़कर समाज में सर उठाकर जीयें। कर्नाटक से शुरू हुआ ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन’ अब देश के 25 राज्यों में सक्रिय है।

 

इस आंदोलन के द्वारा विल्सन ने मल उठाने के पेशे को जड़ से मिटाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया। उन्होंने लोगों को सक्रीय किया, जागरूकता के लिए रैलियाँ की और लोगों को बेहतर काम दिलाया।

 

विल्सन कहते है, “सबसे बड़ी चुनौती ये है कि लोग खुद अपने काम को लेकर शर्मिंदा रहते हैं। वो इसके बारे में बात ही नहीं करना चाहते हैं। सबसे पहले हमें लोगों को एक साथ लाना है।”

 

विल्सन के सफाई कर्मचारी आंदोलन ने देश भर में अपने पाँव जमा लिए हैं। इससे लगभग 6000 स्वयंसेवक जुड़े हुए हैं। ये लोग मल उठाने का काम करने वालों की समस्याओं पर चर्चा करते हैं। उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताते हैं। लोगों को इस काम से निकलने और पुनर्वास में मदद करते हैं।

Wilson's team organizes various rallies to raise their voice against this profession.

विल्सन की टीम विभिन्न रैलीयों द्वारा इस काम का विरोध करती है !

 

नारायन अम्मा इस आंदोलन से आए बदलाव की एक बेहद साफ तस्वीर पेश करती हैं। पहले नारायन अम्मा मल उठाने का काम करती थीं। इस आंदोलन से जुड़ने के बाद उन्होंने इस निम्न पेशे को “ना” कहने की हिम्मत दिखाई। नारायन अम्मा ने न सिर्फ हाथों से मल उठाने का काम छोड़ा बल्कि ई-रिक्शा चलाकर नया रोजगार भी ढूँढ लिया।
2003 में विल्सन ने एक जनहित याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने सभी राज्यों, रक्षा, शिक्षा, रेलवे और न्याय जैसे सरकारी विभागों में भी Manual Scavenging Prohibition Act का उल्लंघन होने की बात कही थी। इस जनहित याचिका के बाद ये मुद्दा जोर-शोर से उठा था।

 

1996 में 15 लाख से ज्यादा लोग इस काम में लगे हुए थे। विल्सन के अथक प्रयासों के कारण 2013 में ये संख्या 2 लाख पहुँच गई। हालाँकि, विल्सन को इस संख्या के लिए “शून्य’ से कम कुछ भी नहीं चाहिए।

Wilson is on a mission and says he won;t rest till the last manual scavenger i eliminated.

विल्सन तब तक नहीं रुकेंगे जब तक आखरी मॉल उठाने वाला भी इस काम को छोड़ नहीं देता!

 

कई अन्य संस्थाओं ने भी विल्सन के ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन’ के मॉडल को अपनाया। जिन लोगों ने ये काम छोड़ा उनको दूसरे रोजगार करने में सहायता की गई।

 

विल्सन की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। वो मल उठाने के पेशे को जड़ से खत्म करना चाहते हैं। वो समाज से जाती प्रथा का भी अंत करना चाहते हैं।

 

“उन लोगों ने जिन्दगी भर यही काम किया है इसलिए वो किसी और काम के बारे में सोच ही नहीं पाते हैं। वो अगर इस काम को छोड़ना चाहते भी हैं तो भी उनके लिए मुश्किल होता है। इसके लिए उन्हें इसके लिए प्रेरणा की जरूरत होती है। ये आंदोलन उन्हें यही प्रेरणा देता है। मैं चाहता हूँ कि हमारे देश में एक भी व्यक्ति ऐसा न हो जिसे ये काम करना पड़े। ”

– विल्सन ।

 

विल्सन की लगन और लगातार संघर्ष को देखते हुए हमे यकीन है कि ये कुप्रथा जल्द ही हमारे देश से पुरी तरह ओझल हो जाएगी!

विल्सन के काम के बारे में अधिक जानकारी हासिल करने के लिए आप उनकी वेबसाइट पर जा सकते है!

 

मूल लेख – श्रेया पारीक 


यदि आपको ये कहानी पसंद आई हो या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें contact@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter (@thebetterindia) पर संपर्क करे।

शेयर करे

Leave a Reply

Your email address will not be published.