किसी निर्माणाधीन इमारत के बनने की कल्पना कीजिए। आपकी कल्पना में ठेकेदार से लेकर मजदूर, बढ़ई, पेन्टर, सब पुरूष ही होंगे। हकीकत भी इस कल्पना के करीब ही है। ऐसी जगहों पर महिलाएं काम करती भी हैं तो वो मजदूरी का ही काम करती हैं। इसके लिए उन्हें पैसे भी नाम मात्र के ही मिलते हैं। जबकि, अगर इन्हें मौका मिले तो अपने कौशल से न सिर्फ अपनेआप को पुरूषों से बेहतर सिद्ध कर सकती हैं, बल्कि सारे काम बिना किसी पुरूष सहयोगी के निबटा सकती हैं।

 

भुवनेश्वर के सालिया साही झुग्गी में रहने वाली राधारानी की अलग पहचान है। अपने घर और साइट पर अपने काम को बेहतर ढंग से पूरा करने का खाका वो खुद ही तैयार करती हैं। राधारानी 43 साल की हैं और अपनी झुग्गी की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं।

 

राधारानी एक कुशल पेन्टर हैं। उन्होंने स्थानीय निर्माणकार्यों के व्यापार में अपनी जगह बना ली है। उनके व्यवहार और काम में दक्षता के कारण सब उनका आदर करते हैं। राधारानी की अपनी टीम है। इस टीम में पाँच महिलाएं हैं। इन महिलाओं को प्रशिक्षण भी राधारानी ने ही दिया है। उनका पूरा ध्यान काम को सही तरीके से समय पर पूरा करने में होता है।

 

जब राधारानी ने इस काम के लिए कदम बढ़ाए तो उनके लिए राह आसान नहीं थी। पहले तो ठेकेदार ही उनसे काम लेने से मना कर देते थे। वो जहाँ भी काम करतीं, लोग एक महिला पेन्टर को देखकर चौंक जाते थे।

 

वो बताती हैं, “6 साल पहले मुझे पेन्टिंग का एक ठेका मिला था। मैं सीढ़ी लगाकर अपना काम कर रही थी, तभी इंजीनियर इन-चार्ज ने मुझे पुकारा। जैसे ही मेंने अपने सिर से कपड़ा हटाया, वो मुझे देख कर हैरान रह गए। वो बोले कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि पेन्टरों की किसी टीम की मुखिया एक महिला होगी।“

 

राधारानी ने यह काम अपने पति, शंकर प्रधान से सीखा है। उनको इस काम में लाने का फैसला भी पति का ही था। उन्हें अपने दो बच्चों की पढ़ाई के लिए ज्यादा पैसे कमाने की जरूरत थी।

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कभी-कभी राधारानी को अपने पति से ज्यादा काम और पैसे मिल जाते हैं। राधारानी ने बताया कि उनके पति इस बात से खुश तो होते ही हैं और घर के कामों में उनका हाथ भी बँटाते हैं।

 

राधारानी की ही तरह सविता सतुआ संगमरमर की एक कुशल कारीगर हैं। हालाँकि, उन्हें कभी-कभी अपने पुरूष साथियों की वजह से दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सविता की उम्र 45 साल है।

Sabita Sathua (Credit: Rakhi Ghosh\WFS)

 

सविता बड़े गर्व से बताती है,”इस क्षेत्र में लोग महिलाओं के स्वीकार नहीं करते। लोगों की मानसिकता है कि महिलाओं को बस मजदूरी करनी चाहिए। लेकिन मैंने बेहतर काम करके सबको गलत साबित कर दिया।“

 

काम के अलावा व्यक्तिगत जीवन में भी सविता संघर्षों से जूझती रहीं। पति ने उन्हें छोड़ दिया तो अपने बच्चे को संभालने के लिए सविता को दिन-रात मेहनत करनी पड़ी। पहले तो उन्होंने मजदूरी करना शुरू किया। पर, जब इससे हालात नहीं सुधरे तो उन्हें और पैसे कमाने की जरूरत महसूस हुई। उन्हें लगा कि ज्यादा पैसे कमाने के लिए किसी काम में कुशल होना पड़ेगा।

 

सविता ने कहा, “मैंने देखा कि पत्थर के कारीगरों को अच्छे पैसे मिल जाते थे इसलिए मैंने ये काम सीखने का फैसला किया। जब मैंने कुछ कारीगरों से मुझे काम सिखाने के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया। आखिर एक महिला पत्थर की कारीगरी के काम में कैसे लग सकती है? पर, मैंने उन्हें मना लिया। मैं अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार थी। अब वो कॉलेज में पढ़ता है।“

 

15 साल से सविता का कद अपने काम में लगातार बढ़ता गया।

सविता कहती है ,“मैं पुरूषों की पूरी की पूरी एक टीम के साथ काम करती हूँ। कई बार हमारे बीच मतभेद होते हैं, लेकिन वो जानते हैं कि टीम की इंचार्ज मैं हूँ। पुरूषों की मानसिकता ही होती है महिलाओं से काम लेना या उनका शोषण करना. लेकिन मेरा ख्याल है कि ये काफी हद तक महिलाओं पर निर्भर करता है कि वो उनसे किस लहज़े में निबटती हैं। “

 

राधारानी और सविता जैसी महिलाओं का दृढ निश्चय और उनके परिवार का सहयोग उन्हें इस क्षेत्र में काफी आगे तक ले जा सकता है। लेकिन, अब भी इनकी संख्या कम ही है।

Most women still work as unskilled daily wagers, commuting daily from the fringes of the city to the labour ‘nakas’ (markets) around Bhubaneswar where contractors come to hire. (Credit: Rakhi Ghosh\WFS)

 

प्रशिक्षण संस्थानों की कमी, सामाजिक प्रतिबंध, निम्न मानसिकता जैसी चीजें इन महिलाओं के रास्तों में बड़ा रोड़ा बन जाती हैं।

 

राज्य के अन्य हिस्सों की बात करें तो खुर्द जिले के तंगी ब्लॉक से बड़ी संख्या में लोग पलायन करते हैं। इनमें से ज्यादातर मछुवारे हैं जो चिलिका झील में मछलियों की कमी के कारण पलायन कर रहे हैं। हर साल लगभग 5000 लोग निर्माण कार्यों में मजदूरी करने के लिए भुबनेश्वर आते हैं। इनका बाजार (नाका) लगता है, जहाँ से ठेकेदार इनको काम पर रखते हैं। इनके पास मोलभाव करने का कोई अवसर नहीं होता है। ऐसे में महिलाओं की स्थिती और खराब है।

 

अनिमा बेहरा बताती हैं, ”ठेकेदार पुरूषों को ज्यादा पैसे देते हैं। उन्हें लगता है कि महिलाएं पुरूषों जितना काम नहीं कर सकतीं हैं। वो बस पुरूषों के काम में हाथ भर बटा सकती हैं।“

 

अनिमा जैसी महिलाओं की स्थिति आज बदतर है। लेकिन, उड़ीसा बदलाव की दहलीज पर ही है। राज्य ने  The Building and Other Construction Workers (Regulation of Employment and Conditions of Service) Act 1996,लागू कर दिया है जिसमें निर्माण मजदूरों के लिए 20 से ज्यादा सामाजिक सुरक्षा की गारंटी है।

 

इन महिलाओं की मदद के लिए, उनकी शिक्षा और शादी में सहयोग के लिए और मातृत्व के लिए सुविधाओं की गारंटी के लिए राज्य श्रम विभाग, इनका पंजीकरण कर के, इन्हें पहचान पत्र दे रहा है।

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31 मार्च 2016 तक लगभग 14,24,531 लोगों ने पंजीकरण कराया है।  Odisha Building and Other Construction Workers Welfare Board.के चेयरपर्सन सुभाष सिंह ने बताया, ‘महिलाओं को लेबर ऑफिस आने का समय नहीं मिल पाता है। इनका पंजीकरण हम इनके काम के स्थानों पर जाकर करेंगे। इसके लिए वो विभाग में लोगों की संख्या बढ़ाने का सोच रहे हैं। उड़ीसा राज्य सामाजिक सुरक्षा बोर्ड इन लोगों को अनऑर्गनाइज्ड आइडेन्टिफिकेशन नम्बर कार्ड देने की भी तैयारी कर रहा है।

 

लेबर कमिश्नररूपा मिश्रा श्रमिकों के भविष्य के लिए काफी आशावादी हैं। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने 6 RPL (रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग) प्रशिक्षण सहयोगियों के साथ MoU साइन किया है। इससे श्रमिकों के कौशल विकास में मदद ली जाएगी।

 

“अब तक 47 हजार मजदूर इस प्रशिक्षण का लाभ ले चुके हैं। हम प्रशिक्षण में आने के लिए मजदूरों को 200 रूपए देने पर विचार कर रहे हैं जिससे वो अपना काम छोड़कर आ सकें”, रूपा ने कहा।

 

राधारानी और सविता न सिर्फ कुशल टीम लीडर हैं, बल्कि अपनी साथियों की जरूरत भी समझती हैं। इसलिए वो महिलाओं और पुरूषों को बराबर काम के बराबर पैसे भी देती हैं।

ऐसे में नए कानून को लागू करने और श्रमिकों के कौशल विकास की राह थोड़ी आसान अपनेआप हो जाती है।

 

मूल लेख राखी घोष द्वारा लिखित।

 

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