उड़ीसा के रहने वाले इमरान ने तम्बाकू के खिलाफ व्यक्तिगत स्तर पर लड़ाई लड़ी और उसमे अपनी पूरी जान लगा दी। 

 

म्बाकू और शराब की लत के खिलाफ अपनी लड़ाई के बारे में बताते हुए मो. इमरान अली कहते हैं, “हमारी लड़ाई भी एक लत की तरह है जो हमने इस लत के खिलाफ छेड़ी है। हमने हर दिन इसके लिए अपने देश को एक रुपया और दिन का एक घंटा देने का सोचा है।”

 

जब इमरान मास्टर्स इन सोशल वर्क की पढाई कर रहे थे, तब एक फील्ड विजिट के दौरान वो भुवनेश्वर के एक झुग्गी, शांतिपली में गए। वहां जाकर वो सन्न रह गए जब उन्हें पता चला कि वहां दस साल की उम्र के बच्चे भी गुटखे और तम्बाकू की लत के शिकार थे। जब उन्होंने पता लगाया तो उन्हें मालूम हुआ कि बाज़ार में तम्बाकू के उत्पाद बड़ी आसानी से उपलब्ध थे और उनके माता पिता की लापरवाही के कारण बच्चों को ये सब आसानी से मिल जाता था। यह नशा बाद में चल कर होने वाले बड़े नशे जैसे की शराब की लत, ड्रग्स की लत इत्यादि का कारण बनता था। इस वास्तिवकता ने इमरान को हिला कर रख दिया था।

 

उन्होंने एक किताब लिखी और प्रकशित भी की जिसका शीर्षक था “Bloody Gutka”। इस पुस्तक में उन्होंने तम्बाकू के सेवन से होने वाले भयंकर नुकसानों के बारे में लिखा है।

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इसके बाद उन्होंने एक जागरूकता अभियान चलाया जिसमे झुग्गी में रहने वाले उनके मित्रों ने उनकी सहायता की। इस अभियान के तहत उन्होंने उन बच्चों के माँ बाप से इस बारे में बात की। धीरे धीरे ये कारवां बड़ा होता गया और भुवनेश्वर में “नशा मुक्ति युवा संकल्प” (NMYS), की स्थापना हुई।
इस समूह में करीब ३० युवा हैं जो स्वेच्छा से यथासंभव कार्य करते हैं। उन्होंने शुरुआत स्कूलों और कॉलेज में जागरूकता कार्यक्रम से की और धीरे धीरे अपने लक्ष्य की और बढ़ते गए।

 

“हमे पता चला कि उड़ीसा के कई मिल्क बूथ OMFED (Orissa State Cooperative Milk Producers’  Federation Limited) असलियत में तम्बाकू पदार्थों का अड्डा बन चुके थे। मैंने अपने एक मित्र जीतेन्द्र साहू के साथ मिल कर उड़ीसा हाई कोर्ट में एक पी आई एल दाखिल की और हाई कोर्ट से अपील की, कि मिल्क पार्लरों में गुटखे की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दे,” इमरान ने बताया।

 

एक वरिष्ठ हाई कोर्ट अधिवक्ता बीरेन त्रिपाठी इस केस को मुफ्त में लड़ने के लिए तैयार हो गए और आखिरकार उनकी विजय हुई। कोर्ट ने २०११ में उड़ीसा के सभी मिल्क पार्लरों में तम्बाकू की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

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“इस केस में मिली जीत ने हमारी हिम्मत और बढ़ा दी। मुझे लगा कि हम बिलकुल सही दिशा में जा रहे हैं। और जब आप कुछ अच्छा करते हैं तो आपको सराहना और पहचान जरुर मिलती है, “ इमरान कहते हैं।

 

जल्द ही उन लोगों ने गुटखे की बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगवाने की कोशिशे शुरू कर दी ताकि मुंह के कैंसर को रोका जा सके। रिपोर्ट के मुताबिक धुआंरहित तम्बाकू उड़ीसा में होने वाले 40% कैंसर के मामलों में मुख्य कारण होता है। और 43% आबादी धुआंरहित तम्बाकू का सेवन करती है।
जब जागरूकता अभियानों से कोई फर्क नही पड़ा तब उन लोगो ने दुबारा हाई कोर्ट में पी आई एल दाखिल की। इस बार CLAP (Committee for Legal Aid to Poor) नामक एक एन जी ओ उनकी मदद को आगे आया। NMYS एक बार फिर से सफल रहा और 2013 में पूरे राज्य में तम्बाकू पर प्रतिबन्ध लग गया।

 

अपने मिशन को जारी रखते हुए इमरान ने एक उड़िया डाक्यूमेंट्री बनाई जिसका नाम था ‘सलाम जीवन’, जिसमे तम्बाकू से होने वाले नुकसानों के बारे में बताया गया है।

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इसे उड़ीसा सरकार की मदद से राज्य के 2500 कॉलेजों में दिखाया गया था। इमरान ने इसी नाम से एक किताब भी लिखी और इस मुद्दे पर एक और डाक्यूमेंट्री बनाई जिसका नाम था साइलेंट किलर (Silent Killer)। इमरान ने इसे व्हाट्सअप पर भी फैलाया ताकि ये ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँच सके।

 

NMYS के सदस्य मुंह के कैंसर के मरीजों को आचार्य हरिहर रिजनल कैंसर सेंटर ले जाते हैं जहाँ साधनहीनों का इलाज़ मुफ्त में होता है। इमरान ने अपने एक डॉक्टर मित्र डॉ. बी. नायक के साथ मिलकर एक काउंसलिंग सेंटर की भी शुरुआत की है, जो तम्बाकू का इस्तेमाल करने वालों को समझाते हैं ।

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“मुंह का कैंसर अचानक नही होता। यह आने से पहले कई चेतावनियाँ देता है जिन्हें अगर समय रहते समझा जाये तो इस बीमारी का इलाज़ संभव है। काउंसलिंग सेंटर पर हमारा मुख्य उद्देश्य कैंसर से बचाव होता है ” वो कहते हैं।

 

इमरान खुद को खुश किस्मत मानते हैं कि उनकी मदद करने को इतने लोग तैयार हैं। पेशेवर एडिटर, कैमरामैन इत्यादि उनकी फिल्मो के लिए मुफ्त सेवा देते हैं।

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इस समूह के सभी सदस्य स्वैच्छिक रूप से कार्य करते हैं और अलग अलग क्षेत्रों से हैं। इमरान एक कॉलेज में पार्ट टाइम टीचर का भी काम करते हैं , वो मूलतः उड़ीसा के भद्रक जिले से हैं पर ग्रेजुएशन के बाद भुवनेश्वर में रहने लगे। इमरान ने जब पोस्ट ग्रेजुएशन में दाखिला लिया था तभी उन्होंने निश्चय कर लिया था कि वो अपना जीवन समाज सेवा को समर्पित कर देंगे। कोई बैंक उन्हें शिक्षा लोन देने को तैयार नही था।

 

फिर उन्होंने मदद के लिए राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम को पत्र लिखा। राष्ट्रपति के ऑफिस से तुरंत बैंक को चिट्ठी भेजी गयी और उन्हें दो दिन के अन्दर लोन मिल गया ।

 

“इस वाकये से मुझे यकीन हो गया की अगर देश का प्रथम नागरिक मेरे जैसे आम लोगों के लिए इतना समर्पित है तो मेरी देश के प्रति जिम्मेदारी और बढ़ जाती है “ वो कहते हैं।

 

“हर बार जब हम मरीजों को हॉस्पिटल ले जाकर उनके इलाज़ में उनकी सहायता करते हैं वो हमारे प्रति इतना आभार व्यक्त करते हैं मुझे लगता है मैं दुनिया का सबसे धनि व्यक्ति हूँ। जब लोगों को पता चलता है कि उन्हें कैंसर है तो ये उनके लिए बहुत बुरा अनुभव होता है और उन्हें ऐसे वक्त में किसी के सहयोग की और किसी ऐसे व्यक्ति की जरुरत होती है जो उन्हें हिम्मत दे सके। इसीलिए मैं जो कर रहा हूँ, उसे जारी रखूँगा,” वो मुस्कुरा कर कहते हैं।

 

इमरान से संपर्क करने के लिए आप उन्हें  [email protected] पर मेल कर सकते है।


मूल लेख तान्या सिंह द्वारा लिखित।

 

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