किसान – इस शब्द से जो सबसे पहला ख्याल हमारे मन में आता है वो है गरीबी, भुखमरी और …आत्महत्या ! हम सब इस तस्वीर को बदलना चाहते है लेकिन उसके लिए हमे उनकी समस्या के जड़ तक पहुंचना होगा। इसी काम को करने के लिए कलाकारों का एक दल पिछले छह महीनो से मध्य प्रदेश के पारडसिंगा नामक गाँव में युवा किसानो के साथ मिलके खेती कर रहा है। पर ये खेती दाल, चावल या सब्जियों की नहीं है बल्कि एक सन्देश की है। एक सन्देश देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम।

 

ग्राम आर्ट प्रोजेक्ट के सभी कलाकार, जिनमे से अधिकतर किसान भी है, ने किसानी करके तथा सभी किसानो के साथ बातचीत करके ये निष्कर्ष निकाला कि एक युवा इसलिए खेती किसानी को रोज़गार के तौर पर नहीं अपनाना चाहता क्यूंकि ये करने में उसे हजारो मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

 

देसी बीजो का ख़त्म होना, विदेशी कीटनाशको का इस्तेमाल, सड़क का न होना और पानी की समस्या जैसे कई मसले है जिनका हल तभी निकलेगा जब प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया की तरह ग्रो इन इंडिया याने देश में ही उगाओं की भी पहल करे।

 

इसी सन्देश को पहुंचाने के लिए इन कलाकारों और किसानो ने देसी बीजो से एक खेत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा तथा “Dear Prime Minister, Please Grow in India” का सन्देश उगाया है तथा उन्हें एक खुला ख़त भी लिखा है। 7200 sq ft बड़ा यह लैंड आर्ट देश का अब तक का सबसे बड़ा लैंड आर्ट है।

 

art

” DEAR PRIME MINISTER PLEASE GROW IN INDIA”

 

प्रधान मंत्री को लिखा खुला ख़त इस प्रकार है :

 

प्रिय प्रधानमंत्री,

आशा करते है कि आप कुशल-मंगल होंगे। हम भी यहाँ ठीक है, पर कुछ चिंताएँ, कुछ अस्वस्थता लेकर हम, एक बहुत बडी युवा पीढी, आपसे अपने मन की बात करना चाहते है। क्योंकि आप हमारे प्रधानमंत्री है जिन्हें हम जैसी युवा पीढी ने बडी संख्या मे चुना।

 

हम सब का एक सपना है, कि हर दिन जब आँख खुले, तो हमे हमारा भारत खुशहाल दिखे। हम सिर्फ सपना देखने मे ही नही, उसपर काम करने के लिए भी पीछे नही हटते। देश के कितने ही लोग है, जिन्होने अपनी पूरी उम्र देश के लिए काम करते हुए बीतायी है और कितने ही निष्ठावान नौजवान है जो देश के लिए कुछ रचनात्मक कार्य करना चाहते है। आज हम कुछ युवा किसान मिलकर खेती करना चाहते है, उसकी कहानी बताना चाहते है और यही  कहानी पूरे देश की भी है।

 

जिस गाँव के खेत मे बैठकर यह पत्र लिखा जा रहा है, वहाँ के हर खेत मे बीटी (BT) कपास उगाया जाता है जिसके लिए बस दो ही पानी काफी है। दुर्दैव की बात यह है कि कपास खाया नही जा सकता है और किसान के पास पुराना कोई बीज बचा नही है। खाना तो राशन का मिल ही जाता है। गरीबी रेखा के नीचे वालों को उसमें मिलने वाले पत्थर, चुहों की विष्ठा, कचरा भी साथ मे मुफ्त आता है और उस भोजन की ‘गुणवत्ता’ इसकी परिभाषा का तो कोई सवाल ही नही उठता। खेत से जानेवाला हर रास्ता पीछले कई शतकों से शौच और कीचड-कचरे से भरा है।  बाते सडक की करे तो आज की नयी फॅक्टरी हो या दस साल पुरानी उन्हे पानी, बिजली और रास्ते की तो कोई कमी ही नही है। Make in India  तो सही बात है, पर Grow in India का क्या? अब तो देसी बीज गायब होने की कगार पर है। किसान को तो संकरित बीज, कीटकनाशक, खरपतवार नाशक की आदत लग गयी है। क्या अब हम सब उस दिन की राह देखे जहाँ हमारा भोजन, हमने क्या खाना चाहिये या खाना चाहिये भी या नही ये कोई और तय करे? आज जब किसान और खेत मजदूर काम पर चले जाते है तो ये चिप्स या पॅकेट फुड बच्चों के हाथों मे दिखते है जो कि ज्यादा तर एक्स्पायरी डेट के होते है। क्या ये इतना बडा तबका जो गाँव मे रहता है, उसका कोई मोल नही। घर-घर शौचालय योजना तो है, पर क्या हर शौचालय मे पानी है। शौचालय से कुएँ की दूरी कितनी है। कंस्ट्रक्शन की गुणवत्ता कौन देखता है? फैक्टरियों मे जाने वाली सिमेंट, डामर की सडके और सदियों से खेतों मे जाने वाली सडको मे इतना बडा अंतर क्यों? यह सब और बहुत से और सवाल है, जो आप तक हर दिन और सालों से पहूँच रहे होंगे।

 

मन मे एक सवाल आया है कि आपका खाना कौनसे खेत से आता होगा? क्या वो रसायनमुक्त होंगा या रसायनयुक्त? हम तो सालों से रसायन-युक्त ही खाते आ रहे है और अगर आप भी खाते है तो हम भी खा ही लेंगे। प्रधानमंत्री जो देश के प्रधान व्यक्ति होते है, हम तो प्रेरित आपसे ही होंगे ना।

 

दुसरा सवाल यह उठता है मन मे कि क्या आप के कपडे बीटी कपास से बनते होंगे? सुना है, बाहर देश मे तो लोग अगर बीटी (BT) कपास के कपडे भी पहन ले तो चमडी के रोग लग जाते है और देखा भी है कि बीटी के बीज हमारे गाय-बैल वगैरह खाने से बीमार होकर मर भी जाते है। पर आजकल गायें रखना भी तो मुश्किल हो गया है ना। अब तो कुछ सालों से गाँव मे पॅकेट का दूध आने लगा है।

 

आशाएँ और सपने बहुत है, आपके साथ मिलकर देश के लिये काम करना है। बस थाली कुछ रंगों मे सीमट गयी है और शरीर की उर्जा भी। फिर भी हम हर दिन पुरी ताकत से खडे होते है। आपसे आशा करते है और आपकी योजनाओं पर भरोसा। ऐसी ही एक योजना ‘बलराम तालाब योजना’ का सहारा लेकर पीछले साल हमने एक तालाब बनाया। वैसे Water Conservation का काम और खेत तालाब तो किसानों को बनाकर मिलना चाहिये क्योंकि पानी की समस्या देश की समस्या हो गयी है और हर किसान तालाब बनाने के लिये एक लाख रुपया कहाँ से लाये? जो तालाब हमने बनाया उसे देखकर कुछ बुढी और कुछ जवान आँखों मे एक सपना आया और हिंमत करके वो गये भी थे सरकारी कार्यालय मे बात करने, पर पता लगा कि ‘बलराम तालाब योजना’ इस साल से बंद हो गयी है, जिसकी जगह प्रधानमंत्री तालाब योजना ने ली है। जो कि अभी तक लागू ही नही हुई है। तो हमें यह लगता है कि आपने तो वह योजना हर कार्यालयों मे पहूँचा ही दी होगी। अब तो जून दूर नही है। तो क्या ये पूरा साल बीत जायेगा और पानी का चेहरा अब अगले ही साल देखने को मिलेगा? इस नयी योजना मे तालाब का क्षेत्र भी बढा  हुआ, अनुदान और लागत का पैसा भी। फिर छोटा किसान इसका लाभ कैसे उठाए?

 

हमारे कुछ युवा प्रगतीशील किसान है गाँव मे जो आज इस Make in India के जमाने मे भी समाज से लडकर खेती करना चाहते है। जमीन से जुडे रहना चाहते है। इस संभावित शंका को समझते हुए भी कि कल उनकी खेती SEZ की बली चढ सकती है, अपना पूरा जीवन Grow in India को देना चाहते है। इन किसानों ने कुछ हफ्तों पहले खुद अपने मे ही चंदा इकट्ठा कर एक सडक बनायी जो ५० खेतों को जोडती है। बारिश मे पीछले सौ सालों से घुटने तक पानी, साँप, बिच्छू और काँटों के बीच से किसान इस सडक को पार करते थे। आधी लडाई तो उन्होंने जीत ली पर उस सडक तक पहूँचने के लिये एक और कच्ची सडक है जो गाँव से होकर वहाँ तक पहूँचती है। उसका आवेदन वे कई बार लगा चूके है, जिसका आज तक कोई जवाब नही आया। अब तो बारिश बहुत करीब है। मन की बात मे हम बहुत बार सुन चुके है कि आप एक कदम आगे बढाओं तो मै दो कदम आगे बढाऊंगा। पर क्या आपसे जुडे सारे लोग ऐसा ही सोचते है?

 

हम सब मिलकर एक ऐसे भारत की कल्पना करते है, जहाँ हमारा भोजन, हमारा पानी, हमारे कपडे, हमारा मकान और हमारी जमीन विष-मुक्त हो। दस साल पुराने किसान आयोग की टिप्पनियों को लागू होने मे अब कितने और साल लग जायेंगे, किसानों को अपनी उपज के सही दाम कब मिलेंगे? गाँव की दीवारों, समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों पर विष भरे बीजों, रसायनों और खरपतवार नाशकों के विज्ञापन और हमारे भारत मे इन सारे कंपनियों के खाते कब बंद होंगे? हमारे थालियों मे से विष कब खतम होंगा? हमने तो अपना कदम बढा लिया है। एक देसी बीज का उत्सव हम २२-२३ मई 2016 को कर रहे है, जिसमे हमने महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के देसी बीज लेकर कुछ किसानों को आमंत्रित किया है। इस खरी और देश के हित मे होने वाली लडाई मे हम आपको भी आमंत्रित करते है। यह आमंत्रण पत्र तो हम खेत मे ही उगा रहे है, जिसमे हमने देसी बीजों के इस्तेमाल से हमारे प्रधानमंत्री का चित्र उगाया है और उसमे अपील करते है कि “Dear Prime Minister, Please Grow in India”

 

हम तो एक सामान्य युवा पीढी है जो अपने तरीकों से रोज देश के प्रगती के लिये लडते है, कभी हारते है, कभी जितते है, हर दिन सपने देखते है और उसे साकार करने के लिये नई ताकत, नई उर्जा से भी खडे होते है और हर दिन एक नया परिवर्तन करने मे सक्षम है और इसीलिये जानते है कि जिसके हाथ मे सत्ता है, अगर जो चाहे तो बहुत बडा बदलाव ला ही सकता है। आप से हमे बहुत सी अपेक्षाएँ है।

 

आपके

पारडसिंगा गाववासी

 

यदि आप भी किसानो की मदद करना चाहते है या इस बीज महोत्सव का हिस्सा बनना चाहते है तो निम्नलिखित पते तथा फ़ोन नंबर पर संपर्क कर सकते है –

Venue: Gram Art Project, Paradsinga, Chhindawara road, Madhya Pradesh

Date: 22nd & 23rd May 2016
Time: 8am to 6pm

Phone Number: 9373112320, 9373112912

Email – gramartproject@gmail.com

इन युवा कलाकारो तथा किसानो को ये विश्वास है कि आपके सहयोग से यह खुला पत्र प्रधानमंत्री तक ज़रूर पहुंचेगा और देश का किसान एक बार फिर से खुशहाल होगा ।

 

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