बचपन से ही सेरिब्रल पाल्सी से गेअस्त राजवी ने कभी अपनी शारीरिक कमी को अपनी इच्छाशक्ति के आड़े नहीं आने दिया। जीवन के कई उतार चढ़ाव और संघर्षो से जूझने के बाद आज राजवी स्वयं अपने पैरो पर कड़ी है और लाखो लोगो के लिए एक मिसाल है !

“मैं समय से पहले पैदा हो गयी थी। जब मैं सात महीने की थी तब पता चला कि मुझे सेरिब्रल पाल्सी है। सेरिब्रल पाल्सी दिमाग के  कुछ हिस्सों में होने वाली क्षति के कारण होता है और इस बीमारी से ग्रस्त बच्चे बाकी बच्चों की तरह करवट बदलना, बैठना या चलने जैसे साधारण गतिविधियाँ भी नहीं कर सकते। उनका विकास बाक़ी बच्चों की तुलना में काफी धीरे होता है। जैसे जैसे मैं  बड़ी होने लगी तो मुझे अपने शरीर पर संतुलन बनाने में मुश्किले आने लगी। उम्र के साथ साथ मेरी मुश्किलें बढ़ने लगी थी। मुझे किसी स्कूल में एडमिशन नहीं मिल रहा था। कोई भी स्कूल एक सेरिब्रल पाल्सी से ग्रस्त बच्चे को नहीं लेना चाहता था। आखिरकार एक स्कूल तैयार हो गया। वहां के शिक्षक काफी अच्छे और मददगार थे।

उन दिनों मेरे लिए कोई व्हीलचेयर नहीं था तो मेरी माँ को मुझे गोद में ही उठाकर स्कूल ले जाना और ले आना पड़ता था। मैंने कभी भी अपने आप को अन्य छात्रों से अलग नहीं माना। मैं हर गतिविधि में भाग लेने के लिए तैयार रहती थी चाहे वो बहस हो, निबंध प्रतियोगिता हो या गायन प्रतियोगिता हो। मैंने कभी  भी हीन भावना महसूस नहीं की। कभी-कभी मुझे दुख होता था जब मैं अपने दोस्तों को खेलते देखती थी, क्यूंकि मैं उनकी तरह नहीं खेल सकती थी पर ये एक ऐसा सच था जिसे मुझे स्वीकार करना ही था। लोग मुझे घूरते थे और शायद मेरे पीछे मेरा मज़ाक भी उड़ाते थे पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

मैंने  नकारात्मक विचारों को अपने मन में नहीं आने दिया।

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दसवीं कक्षा के बाद, मैंने आगे की पढ़ाई के लिए वाणिज्य क्षेत्र को चुना। बारवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने कॉमर्स (बीकॉम) में स्नातक के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया, लेकिन मुझे यह देख कर बहुत दुःख हुआ कि एक भी कॉलेज या संस्थान मुझे स्वीकार करने के लिए या यहां तक ​​कि मुझे एक बाहरी छात्र के रूप में भी लेने को भी तैयार नहीं था। सबसे अधिक परेशानी की बात यह थी कि एक भी संस्थान के परिसर में रैंप की सुविधा नहीं थी।

यह हमारे समाज के लिए वास्तव में बहुत दुःख की बात है। इस कारण मुझे आर्ट्स विषय लेना पड़ा और मैंने  अर्थशास्त्र (BA) में बाहर से स्नातक किया।

स्नातक के बाद नौकरी की बारी आई। मैंने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन दिया था, और कई साक्षात्कार भी दिए। लेकिन जैसे ही वो लोग मुझे  व्हीलचेयर में देखते मुझे रिजेक्ट कर देते।

मैंने ४ साल का गायन का भी कोर्स किया, लेकिन जब परीक्षा का समय आया तो वहां कोई रैंप नहीं था और इसलिए मैं परीक्षा नहीं दे पाई। इसलिए मैंने वह कोर्स छोड़ दिया।

मैंने देश के कई हिस्सों में यात्रा भी की है। मैंने व्हीलचेयर पर होते हुए भी कई गायन प्रतियोगिताओं में भाग लिया है। मैंने एंकरिंग भी की है और बेस्ट एंकर के पुरस्कार भी जीतें हैं। मैं जल्द ही कार चलाना भी शुरू करने वाली हूँ । २०१२ में मुझे वोडाफोन के एक बड़े  आउटबाउंड कॉल सेंटर (Vikalp Centre) का टेली मार्केटर बनाया गया था और कुछ ही महीने पहले मुझे टीम कोच बनाया गया। आज मेरे सेंटर पर मेरे खुद के ३६ ग्राहक है। हो सकता है सामान्य लोगो के लिए यह छोटी सी बात हो, लेकिन यह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि है।

मैं अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार को देती हूँ जो हर मोड़ पर मेरे साथ खड़ा रहा। मेरी इच्छा शक्ति और सकारात्मकता सिर्फ २० % है , बाकि का 80% उनका समर्थन है जिसने मुझे यहाँ तक पहुंचाया है।

मुझे अपने जीवन के साथ हर दिन लड़ना पड़ता है, लेकिन मैं कभी नहीं रुकी और न आगे कभी रुकूँगी। कई डाक्टरों ने मेरी इच्छा शक्ति को सराहा है, उनमे से एक ने तो यहाँ तक कहा कि उन्होंने इतनी इच्छा शक्ति और अद्भुत संचार कौशल के साथ आज तक किसी मरीज ​​को नहीं देखा है। मैं अब दो एनजीओ के साथ भी जुडी हूँ -उड़ान और पीएचए इंटरनेशनल। हम पीएचए इंटरनेशनल में भी विशेष रूप से विकलांग लोगों के लिए एक दिन का नवरात्रि गरबा आयोजित करते हैं और पुरस्कार वितरित करते हैं। वर्तमान में मैं २८ साल की हूँ और विदेश में अध्ययन और अर्थशास्त्र में  मास्टर्स करना मेरा सपना है, लेकिन इसके लिए मुझे पैसों की ज़रूरत होगी जो फिलहाल मेरे पास नहीं है ।

मैं दो संदेश देना चाहती हूँ ,एक समाज के लिए है और दूसरा मेरे विकलांग दोस्तों के लिए है।

समाज के लिए संदेश यह है कि मेरे जैसे लोग शारीरिक रूप से नहीं मानसिक रूप से विकलांग होते है, हमारे सपनों में कटौती न करें। हम व्हीलचेयर पर हैं, लेकिन हम उड़ान भरने के सपने देखते हैं। हम भी इंसान हैं और इस समाज का  हिस्सा हैं, हमें कम  नहीं समझें।

मेरे विकलांग दोस्तों को मैं ये कहना चाहती हूँ कि वो महत्वाकांक्षी बने और अपने आत्म सम्मान को ऊँचा रखें। सपने देखें, अपना लक्ष्य निर्धारित करें और उसे प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करें । अपनी विकलांगता को एक विफलता के रूप में स्वीकार न करें। अपनी विकलांगता को एक अवसर में बदल दें। विकलांगता सिर्फ हमारा  ५ % हिस्सा है बाकी का  ९५% हमारी प्रतिभा है। ”

– राजवी गोसलिया

Via – Humans Of Amdavad

राजवी की कहानी यकीनन एक बेहद  प्रेरणात्मक कहानी है। पर इस कहानी के ज़रिये यह एहसास भी होता है  कि किस तरह हम एक शारीरिक कमी को मानसिक कमी में तब्दील कर देतें है, किस तरह हमारा दिव्यांग  लोगो को अलग नज़र से देखना उनके आत्मविश्वास की नींव को हिला सकता है।

हमारे शिक्षण संस्थानों को इस बात का ख्याल रखना होगा कि सिर्फ एक रैंप न होने के कारण किसी के ४ सालों की मेहनत असफल हो सकती है। अपने सभी पाठकों से अपना नजरिया बदलने की अपील करते हैं और राजवी जैसे लोगों को सलाम करते हैं जिन्होंने खुद को मुश्किलों से बड़ा साबित कर के दिखाया है ।

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