एक ऑस्ट्रेलियाई मार्क बल्ला २०१३ से भारत के स्कूलों में शौचालय बनवाने के लिए पैसे इकठठे कर रहे हैं । धारावी के एक स्कूल को देखने के बाद उन्होंने एक संस्था बनाई जिसका उद्देश्य स्कूलों में २०,००० शौचालय बनाना है  ताकि लड़कियों को अपनी पढाई बीच में ही न छोडनी पड़े। 

“चार साल पहले जब मैं भारत गया था तब मैं दो लोगों से मिला जो मुझे धारावी के एक स्कूल में ले गये। वहां मैं ये देख कर दंग रह गया कि कई किशोरियों को सिर्फ इस वजह से स्कूल छोड़ना पड़ता है क्यूंकि वहां शौचालय नही थे। मेरी खुद की बेटी भी उस वक़्त लगभग उसी उम्र की थी और मुझे लगा ऐसी परिस्थिति बिलकुल भी स्वीकार्य नही है

–मेलबोर्न निवासी मार्क बल्ला कहते हैं।

भारत के स्कूलों में शौचालय बनाने में मार्क का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

धारावी से लौटने के डेढ़ साल बाद मार्क ने ऑस्ट्रेलिया में कई लोगो से इस बारे में विचार विमर्श किया।
खुद इस बात को समझने के साथ साथ वो यह बात दुसरे लोगों भी समझाना चाहते थे।

आखिरकार २०१३ में अपने कुछ दोस्तों की मदद से उन्होंने एक संस्था बनाई जिसे नाम दिया –We Can’t Wait to help raise money and awareness about the lack of toilets in schools in India जिसका मतलब है, ‘हम भारत में शौचालय बनवाने के लिए पैसे इकठ्ठे करने और जागरूकता फैलाने का और इंतज़ार नहीं कर सकते।

Mark Ball in the centre

मार्क बल्ला (बीच में )

“हमने इस बारे में बोलना और लिखना शुरू किया ताकि हम लोगों को जागरूक भी कर सकें और साथ ही साथ कुछ फण्ड भी इकठ्ठा कर सकें। मैंने रोटरी इंटरनेशनल के साथ काम करना शुरू किया और आज भी हमारी संस्था रोटरी के साथ मिल कर काम कर रही है”

-मार्क कहते हैं।

रोटरी इंटरनेशनल एक ऐसा समूह है जो सकारत्मक बदलाव के लिए काम करता है।

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मार्क बल्ला रोटरी क्लब के सदस्यों के साथ

विभिन्न रोटरी क्लब के मेम्बर चुनौतियों से लड़ते हैं, जैसे कि बीमारियों से उन्मूलन, स्वच्छ पानी मुहैया कराना, शिक्षा के अवसर प्रदान करना, और भी बहुत कुछ। रोटरी इंटरनेशनल उन्हें उनकी जरूरतों के हिसाब से सहायता प्रदान करती है ।

मार्क ने सोचा कि वो ऑस्ट्रेलिया में स्कूलों में कार्यक्रम करके चंदा इकठ्ठा करेंगे और फिर रोटरी इंटरनेशनल इस पैसे को भारत भेजने में मदद करेगी और फिर भारत में शौचालय बनेंगे।

मार्क का ये प्लान काम कर गया।

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शौचालय बनके तैयार हो गए

वी कान्ट वेट अब तक ७५ लाख से भी ज्यादा पैसे इकठ्ठे कर चुकी  है। इस संस्था का पहला  प्रोजेक्ट न्यू इंग्लिश स्कूल नासिक,  महाराष्ट्र में था जहाँ शौचालय नहीं थे। मार्क ने वहां १५ शौचालय बनवाए जिसका असर ५०० से भी अधिक बच्चों के जीवन पर पड़ा।

मार्क ने समझाते हुए कहा –

“मेरी संस्था  स्कूलों को चुनती है और फिर प्रक्रिया शुरू करती है। ऐसे बहुत सारे स्कूल हैं और हम उन सब की मदद नही कर सकते हैं। इसलिए हम ऐसे स्कूलों को ही चुनते हैं जहाँ हमारा प्रोजेक्ट सफल हो सके। सबसे जरुरी ये होता है कि वहां के हेडमास्टर, शिक्षक और बोर्ड इसका इच्छुक हो।  स्कूल जरुरत पड़ने पर कुछ आर्थिक मदद करने को भी तैयार हो और शौचालयों की सफाई और देखभाल के लिए भी तैयार हो  और साथ ही साथ सफाई और स्वच्छता को अपने स्कूल के पाठ्यक्रम में भी शामिल करे। अगर हमें लगता है कि वहां को लोग रूचि नही ले रहे तो हमलोग किसी और स्कूल को चुन लेते हैं”

वी कांट वेट शौचालयों के पूरे पैसे अकेले नही देती बल्कि रोटरी क्लब भी इसमें उनकी मदद करती है।

वी कांट वेट फिलहाल नासिक के ७ स्कूलों में१५० शौचालय बना रही है। ये प्रोजेक्ट कुछ महीनो में पूरा हो जाएगा और  ५००० बच्चों के जीवन पर इसका प्रभाव पड़ेगा।

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मार्क को ऑस्ट्रेलिया के अलावा यूके और यूएस की संस्थाओं से  से भी मदद मिल रही है  । इस वजह से ३ और प्रोजेक्ट तैयार हो पा  रहे हैं । कोल्कता की कुछ सस्थाएं भी मार्क से जुड़ना चाहती हैं और मार्क दक्षिणी भारत में भी विस्तार करना चाहते हैं।

मार्क कहते है –

“हमारा मकसद केवल मदद करना है –हम भारत के लोगों को और उन स्कूलों से जुड़े लोगों को बताना चाहते हैं की पूरी दुनिया इसमें उनकी मदद के लिए तैयार हैं।”

मार्क २०१६ के अंत तक ६००-७०० शौचालय बनाना चाहते हैं। २०१९ में  महात्मा गाँधी के १५०वे जन्मदिन तक वो २०,००० शौचालय बनाना चाहते हैं।

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अभी तक के नतीजे बहुत उत्साहवर्धक रहे हैं। अब बच्चें पेट ख़राब होने की वजह से छुट्टी नही लेते हैं। लड़कियां अब माहवारी में भी स्कूल आती हैं। सेनेटरी पैड के लिए स्कूल में बाकायदा डस्टबिन भी हैं।

कई स्कूली बच्चों ने जिद करके अपने घरो में भी शौचालय बनवाए हैं जिसमे रोटरी क्लब ने उनकी मदद की है।

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“पहले १५ शौचालय बनाने के बाद स्कूल के हेडमास्टर ने मुझे बुलाया और कहा –मार्क एक समस्या है। लड़के शिकायत कर रहे हैं। मुझे समझ ही नहीं आया कि लड़के शिकायत किस बात की कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि पानी पीने की लाइन अब लम्बी होने लगी है क्यूंकि लडकियां अब दिन में भी पानी पीने लगी हैं। पहले वो दिन भर बिना पानी पिए रहती थीं ताकि उन्हें टॉयलेट जाने की ज़रूरत न पड़े। हमें ये मालूम नही था, हम ये सुन कर सन्न रह गये थे। मैं अपने प्रयास का प्रभाव देखकर बहुत खुश हुआ।”

–मार्क गर्व से कहते हैं।

मूल लेख तान्या सिंह द्वारा लिखित 

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