गरीब परिवार में जन्मे, सुभाष ने एक रात सपने में देखा कि वो एक सोनार बन गया है और गहनों की दूकान का मालिक है। अपनी लगन और मेहनत से उन्होंने ये मुकाम हासिल भी किया। पर उनकी पहचान इस सोने की दूकान से नहीं बल्कि उनके सोने जैसे दिल से बनी!

चंद्रपुर, महाराष्ट्र में तुकाराम शिंदे सोने-चांदी के कारखाने में मजदूरी किया करते थे। उनके २ बेटे और २ बेटिया थी। उनके बड़े बेटे सुभाष बचपन से ही शरारती थे। स्कूल में दोस्तों की वो हमेशा मदद करते थे। पर उनका दिल कभी पढाई में नहीं लगा। तुकाराम ये बात अच्छी तरह से जानते थे कि सुभाष को पढाई करना और स्कूल जाना बिलकुल भी पसंद नहीं था।

सुभाष बताते है-

“मैं बचपन में ही समझ गया था की पढाई करना मेरे बस की बात नहीं है।“

सुभाष धीरे धीरे अपने पिता का उनके काम में हाथ बटाने लगे। जब वो १४ साल के हुए तब उन्हें अहसास हुआ की उन्हें खुदका व्यवसाय करना चाहिये। इस तरह वो पिता के साथ उनका काम सीखने लगे और दिलचस्पी लेने लगे।

सुभाष पिता के साथ जब काम करने लगे तब उन्होंने ठान ली कि उनका भी एक सोने-चांदी का दूकान होगा। वो दिन-रात इस काम को सीखने लगे ताकि उनको व्यवसाय शुरू करने में आसानी हो।

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सुभाष को समाज कार्य के लिए सेवा सूर्य पुरस्कार दिया गया।

 

चंद्रपुर में उनके दोस्त की ज्वेलरी की दूकान थी। अपने पिता के साथ काम करते करते सुभाष दोस्त के दूकान में भी काम करने लगे। व्यवसाय से संबधित सभी जानकारी हासिल करने लगे। कुछ सालो बाद उन्होंने खुद का व्यवसाय शुरू करने का निश्चय किया। घर की आर्थिक परिस्थिति अच्छी नहीं थी इसलिये दुकान शुरू करने के लिये उन्होंने अपने दोस्तों से पैसे उधार लिए। शहर के सराफा बाजार में एक दुकान शुरू किया।

दूकान के उद्घाटन के लिए उन्होंने बहोत सारे लोगो को आमंत्रित किया। जिसमे गरीब लोग जैसे रिक्शा चलाने वाला और सब्जी बेचने वाले लोग तक शामिल थे।

 

सुभाष का मानना था की अगर मैं गरीब लोगो को अपनी ख़ुशी में शामिल करू तो कुछ दिनों बाद ये लोग मेरा व्यवसाय बढाने में मदद करेंगे।

उनका मानना सच साबित हुआ। धीरे धीरे सराफा बाज़ार में उनका नाम होने लगा। एक दिन उनकी मुलाकात पन्नालाल चौधरी से हुयी जो फूटपाथ पर अपनी छोटी सी दूकान में कपडे इस्त्री किया करते थे। पन्नालाल को कुछ महीने पहले एक बेटी हुयी थी जिसका नाम दिपिका रखा था और उसके दिल में छेद था। ऑपरेशन का खर्चा पन्नालाल नहीं उठा पा रहे थे इसलिये सुभाष ने उनसे वादा किया कि वो सारा खर्चा खुद करेंगे। और इस तरह दिपिका का इलाज मुंबई में हुआ।

पन्नालाल के परिवार को मदद करने के बाद सुभाष को अपने जीवन का मकसद मिला। वो ज्यादा उत्साह से लोगो को उनका दुख दूर करने में मदद करने लगे।

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सुभाष गरीब मरीजो को उनके इलाज के लिये मदद करते हुए।

 

जिन जिन लोगो को सुभाष ने मदद की है सब उन्हें आज बड़े पापा के नाम से पुकारते है। वो सभी गरीब लोगो को हार्ट सर्जेरी के ऑपरेशन में पैसो की मदद करते है। इस काम में पैसे इकट्ठा करने के लिये वो लोगो से मदद मांगते है। आज तक उन्होंने  ४००-५०० हार्ट पेशेंट को मदद की है। वो लोगो को आँखों के ऑपरेशन के लिये भी मदद करते है।

सुभाष एक अनाथालय में हमेशा कपडे, खाना और जरूरती चीजो की मदद करते थे। सुभाष अपना जन्मदिन उस अनाथालय में मनाते है जिसमे करीबी रिश्तेदार और दोस्तों को निमंत्रण देते है। उस दिन वो आनेवाले सभी लोगो को आवाहन करते है कि अनाथालय और गरीब लोगो को अपनी इच्छा से पैसे एवम चीजे भेट दे।

एक दिन उन्हें पता चला कि पैसो के अभाव से संचालक अनाथालय बंद करने वाले है, तब वो व्याकुल हुये। उन्होंने अनाथालय के बच्चो को गोद लेने का निश्चय किया।

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सुभाष के सामाजिक कार्य में उनकी पत्नी, भारती और दोनों बच्चे उनका पूरा साथ देते है

अपने शहर में एक जगह पर वो एक इमारत बनवा रहे है जिसमे अनाथालय के बच्चे रहेंगे। इस इमारत में एक वृद्धाश्रम शुरू करने का भी उनका सपना है। इसके लिये उनकी पहल शुरू हो चुकी है।

सुभाष कहते है –

“अनाथालय में बच्चे अपने करियर को चुन नहीं सकते। लडकियों को हमेशा नर्सिंग की ही ट्रेनिंग दी जाती है। मैं जिस इमारत को बनवा रहा हूँ वो सिर्फ अनाथालय नहीं होगा बल्कि बच्चो का खुदका घर भी होगा। वो बड़े होकर अपना करियर खुद चुन सकते है। बच्चे मुझे बड़े पापा कहकर पुकारते है इसलिये उनके सपनों को पूरा करना मेरा कर्तव्य है।”

सुभाष शिंदे ने आज तक बहुत सारे लोगो की मदद की  है।शुभाष की पत्नी भारती, बेटा विप्लव और बेटी स्नेहल का उनके इस काम में सहयोग है। उनके इस सामाजिक कार्य में उनका पूरा परिवार तन-मन से जुडा हुआ है। सुभाष के एक दोस्त श्रीराम पान्हेकर ने उनके इस सफर को बेहद करीब से देखा है।

श्री पान्हेकर उन सभी लोगो से मिले, जिनकी सुभाष ने मदद की। ऐसी सभी घटनाओ और कहानियों को श्री पान्हेकर ने संकलित किया और एक किताब लिखी। उस किताब का नाम रखा,‘असामान्य सामान्य माणूस- सुभाष शिंदे’। इस किताब द्वारा पाठक उन सभी लोगो के बारे में जान सकते है जिनकी सुभाष ने जिंदगी सवारी।

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सुभाष अनाथालय में बच्चो को जरूरती चीजे भेट देते हुये।

 

सुभाष का मानना है-

“भगवान सिर्फ मन्दिर में ही नही है, बल्कि गरीबो में भी बसता है।इसलिये उनकी मदत करना भी ईश्वर की सेवा करने जैसा होता है। मैं गाडगे बाबा के जीवन से प्रभावित हूँ। मुझे  मेरे एक मित्र ने गाडगे बाबा के जीवन पर आधारित किताब भेट करी। उस किताब को पढने के बाद मेरे जीवन में बदलाव आया।”

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संत श्री गाडगे महाराज

गाडगेबाबा समाज की सेवा करते थे। पुरे देश को स्वच्छ करने का उन्होंने बीड़ा उठाया था। अपने पुरे जीवन काल में उन्होंने स्वच्छ भारत का सन्देश दिया और लोगो को इसमे शामिल किया। देश में बहुत सारी समाज सेवी संस्थाये गाडगेबाबा के इस मिशन को आगे चला रही है। इतना ही नहीं, गाडगेबाबा के नाम से कई पुरस्कार भी दिये जाते है। गाडगेबाबा के इस मिशन से सुभाष बहुत ही ज्यादा प्रभावित हुए।

गाडगेबाबा ने समाज को सन्देश दिया-

“भूखे को खाना दो, प्यासे को पानी दो, जिनके पास कपडे नहीं है उन्हें कपडे दो, घर नहीं है तो रहने का इंतेजाम करो, नौकरी नहीं है तो नौकरी मिलने में मदद करो, असाहाय को सहायता करो, दुर्बल को आत्मनिर्भर बनाओ, गरीब को शिक्षा प्रदान करो, अंधे और अपाहिज लोगो को चिकित्सा की सहायता करो, पशु-पक्षियों से प्रेम करो।”

आज गाडगे महाराज के दिए इन्ही पदचिन्हों पर चलकर सुभाष शिंदे और उनका परिवार समाज को और बेहतर बनाने का हर संभव प्रयास कर रहा है। उनके इस नेक कार्य के लिए हमारी शुभकामनाएं!

 

सुभाष के समाज कार्य और उनके अनाथालय के बारे अगर आप अधिक जानना चाहते है तो उन्हें ९९७०९३१७०१ पर संपर्क कर सकते है।

इस लेख को आप अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते है!

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