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मिलिए माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए प्रख्यात कुमारटूली की पहली महिला मूर्तिकार से !

चायना 17 साल की उम्र से इस कला से जुड़ी हुई है। इस कला पर पुरुषो की अधिक सत्ता होने के बावजूद उन्होंने इस क्षेत्र में अपना एक अलग मकाम बनाया है।
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आपके पसंदीदा कलाकार पढ़ रहे है आपकी पसंदीदा हिंदी कवितायें ‘हिंदी कविता’ नामक युट्यूब चैनल पर!

मनीष गुप्ता की हिन्दी कविताओं के प्रति ऐसी दीवानगी है कि उन्होने हिन्दी कविता को ही अपना काम बना लिया और लोगों तक यह संदेश पहुचाँने के लिए प्रयासरत है कि हिन्दी कविता कितनी शानदार होती है।
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भगत सिंह – मौत ही जिनकी माशुका थी !

आज़ादी के दीवाने और भारत माँ के सपूत क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 में लायलपुर ज़िले के बंगा में (अब पाकिस्तान में) सरदार किशन सिंह के यहाँ हुआ।
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क्रांतिकारी रह चुके 100 साल के पप्पाचन और उनकी 80 साल की पत्नी आज भी करते है अपने खेत का सारा काम!

ये कहानी है एक ऐसे क्रांतीकारी की, जिन्होंने सारी ज़िन्दगी क्रांति का रास्ता ही चुना और 100 साल की उम्र में आज भी क्रांती की मशाल जलाएं हुए है। फर्क सिर्फ इतना है कि जवानी के दिनों में उन्होंने देश को आजादी दिलाने वाले युवाओं के दिलो में क्रांति लायी थी और आज 100 साल की उम्र में केरल के उद्दुक्की जिले में खेती किसानी कर के किसान युवाओं के दिलों में क्रांति ला रहे है।
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मुंबई आकर भीख मांगने और गजरे बेचने को मजबूर किसानो के बच्चो को देश का पहला सिग्नल स्कूल दिखा रहा है जीने की नई राह !

मोहन उन हज़ारो किसानो के बच्चो में से एक है जो अपना गाँव, अपना खेत और अपना घर छोड़कर रोज़गार की तलाश में मुंबई आते है। पर यहाँ भी गरीबी और भुखमरी उनका साथ नहीं छोडती। ऐसे में शिक्षा के बारे में सोचना तक उन्हें दूर की बात लगती है। पर अब देश के पहले सिग्नल स्कूल के खुल जाने से मोहन जैसे कई बच्चो को अपने भविष्य को सुधारने का मौका मिल रहा है।
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रामधारी सिंह दिनकर की कविता – ‘समर शेष है’ !

आज रामधारी सिंह दिनकर के जन्मदिन पर हम आपके लिए उनकी एक ऐसी कविता लाये है जो उन्होंने आजादी के ठीक सात वर्ष बाद लिखी थी। आज़ादी को 69 साल बीत गए। पर दिनकर की ये कविता मानो आज ही की लिखी हुई तस्वीर ज्ञात होती है। कविता का नाम है - 'समर शेष है'।
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BITS पिलानी के इस छात्र ने अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा वृद्धाश्रम को दान कर, की एक खूबसूरत बदलाव की पहल!

आज की पीढ़ी इन परंपराओं को बनाये रखने के साथ साथ इनमे कुछ ऐसे बदलाव भी कर रही है जिससे समाज का भला हो। BITS, पिलानी में पढ़ रहे नमन मुनॉट ने भी ऐसे ही एक बदलाव की पहल की है। उन्होंने अपनी पहली तनख्वाह का 20 फीसदी हिस्सा वृद्धाश्रम को दान में दे दिया।
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अपनों की बेरुख़ी के शिकार बुजर्गों का सहारा बनी, 100 साल की अरुणा मुख़र्जी!

असम की 100 वर्षीय अरुणा मुख़र्जी ने गुवाहाटी नागरिक प्रशाशन से एक वृद्धाश्रम खोलने की अनुमति माँगी है। इस वृद्धाश्रम का संचालन वो खुद ही करेंगी।
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भुला दिए गए नायक, जिन्होंने विभाजन के दौरान बचाई कई ज़िंदगियाँ!

आजादी दिलाने वाले नेताओं के नाम सबकी जुबां पर अमर हो गए। लेकिन इस बँटवारे में अपनी जान की बाजी लगाकर ज़िंदगियाँ बचाने वालों को भुला दिया गया। आज हम लेकर आए हैं ऐसी ही कहानियां जिन्हें आप आमतौर पर नहीं सुनते, न इनकी गाथाएं आजादी के इतिहास से जुडी हैं और न ही इनकी बरसी मनाकर याद किया जाता है।
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शिक्षा से महरूम ज़िंदगियों में ज्ञान का दीप जलाते बंगलुरु के शेरवुड सोसाइटी के लोग!

बंगलुरु के टाटा शेरवुड रेज़िडेंशिअल सोसाइटी में घरेलू काम करने वालों के बच्चे हर रविवार दोपहर में ट्यूशन करने आते है, जो सोसाइटी में रहने वाले लोगों द्वारा संचालित की जाती है। इस सोसाइटी में रहने वाले लोग, एक स्वैछिक समूह 'SEE' के सदस्य हैं जो कि अपार्टमेंट में काम करने वाले कामगारों के बच्चों की स्कूल की सालाना फ़ीस के लिए चन्दा इक्कठा कर मदद करता है।
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पुस्तक समीक्षा : केदारनाथ सिंह की कविता संग्रह ‘अकाल में सारस’!

‘अकाल में सारस’ ऐसी ही कविताओं का संग्रह है, जिसमे 1983-87 के मध्य रची गयी कवितायेँ संकलित हैं। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत यह संकलन कविता को भाषा और भाव दोनों ही स्तर पर ‘भारत’ की जमीन पर खड़ा करता है। ये कविताएँ पाठक के साथ संवाद करती हैं और कविता और मनुष्य के बीच के शाश्वत सम्बन्ध को व्यक्त करती हैं।
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इस क्रिकेट खिलाड़ी ने 3 बच्चो की जान बचाते हुए दे दी अपनी जान !

उन्होंने देखा कि एक 12 साल की बच्ची ढहती हुयी इमारत के निचे खड़ी थी। तभी बबलू ने तुरंत दौड़कर बच्ची को बचा लिया। बबलू ने और एक बच्चे को भी बचा लिया और तीसरे बच्चे को बचाने के लिये कूद पड़े। दुर्भाग्यवश तिसरे बच्चे को बचाते हुए बबलू को खुद की जान जोखिम में डालनी पड़ी।
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बंगलुरु में शुरू हुआ एशिया का पहला फूड ट्रक, जिसमें सभी सदस्य हैं महिलाएँ।

'सेवेन्थ सिन' फूड ट्रक की खासियत ये है, कि यह एशिया का पहला ऐसा फ़ूड ट्रक है,जिसकी सभी सदस्य महिलाएँ हैं।
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गरीबी से लेकर अपंगता भी नहीं रोक पाई मरियप्पन को स्वर्ण पदक जीतने से!

हम असफलता के बहाने खोजते हैं, कभी अपनी रूकावट का दोष परिस्थितियों को, तो कभी हादसों के सिर मढ़ते रहते हैं। परिस्थितियों और हादसों से लड़कर मंजिलें पाने वालों को देखकर हमें एहसास होता है कि इनके मुकाबले हमारी परिस्थितियां तो कुछ भी नहीं थीं। ऐसी ही कहानी है हमारे नायक मरियप्पन की जिन्होंने पैरालंपिक में भारत को एतिहासिक पदक दिलाया।
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हिन्दी दिवस पर जानिये इस दिन से जुड़े कुछ तथ्य, तत्व और मुख्य आयोजन!

हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में 14 सितम्बर 1949 को स्वीकार किया गया। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये 14 सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।